Tuesday, July 6, 2010

क्या विश्व को भारत की देन जीरो हैं?

रोज़ रात को सोते वक़्त संगीत सुनने की आदत है. कल रात को भी कुछ ऐसा ही था. गीतों के चलते चलते अचानक एक डायलोग कान में पड़ा "India's contribution is zero zero and zero". इस के बाद गीत शुरू हुआ ' जब जीरो दिया मेरे भारत ने.................". मन तब से अशांत है क्यूंकि इस गीत में भारत और भारतीयता की जो प्रशंसा की गयी है उस से मन गोरवान्वित तो होता ही है पर आज के हालात देख कर रुदन भी करता है. मेरे भारत देश महान के कुछ तथ्यों की तरफ मैं अपने भाइयों का ध्यान ले जाना चाहता हूँ .........
१. भारत ने संख्या प्रणाली का आविष्कार किया. शून्य आर्यभट्ट द्वारा आविष्कार किया गया था. स्थान मूल्य प्रणाली, दशमलव प्रणाली भारत में 100 ई.पू. में विकसित हुई . आर्यभट्ट ने  499 ई. में  पृथ्वी की गोलाकार आकृति, आकार, व्यास, और पृथ्वी की घूर्णन गति  का सही आकलन किया.
२. विश्व का पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला में 700 ईसा पूर्व में स्थापित किया गया था. विश्व भर के छात्रो ने  60 से अधिक विषयों का अध्ययन किया. नालंदा विश्वविद्यालय ४थी  शताब्दी में बनाया गया जो की शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक था. संस्कृत सभी उच्च भाषाओं की जननी माना जाता है. संस्कृत सबसे सटीक है, और कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए इसलिए उपयुक्त भाषा - फोर्ब्स पत्रिका में एक रिपोर्ट, जुलाई 1987.
३. भास्कर आचार्य (२) ने अपनी किताब "सिद्धांत शिरोमणि' में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत सर आइजैक न्यूटन से ४०० वर्ष पहले दे दिया था. भास्कर आचार्य (२) ने अपनी किताब "सिद्धांत शिरोमणि' में यह भी बताया के पृथ्वी सूर्य का एक  चक्कर ३६५ दिनों में पूरा करती है.
४. नेविगेशन की कला में सिंध नदी में 6000 साल पहले पैदा हुई थी.शब्द नेवीगेशन' शब्द संस्कृत NAVGATIH से व्युत्पन्न है.
५. सकारात्मक और नकारात्मक संख्या और उनकी गणना  को ब्रह्मगुप्त द्वारा पहले अपनी पुस्तक ब्रह्मगुप्त  सिद्धांत में समझाया गया.
६. सूर्य सिद्धांत, प्राचीन भारत के खगोल विज्ञान पर एक पाठ्यपुस्तक, 1000 ई.पू. में संकलित, के अनुसार  पृथ्वी का व्यास 7840 मील जो की  7,926.7 मील की आधुनिक मापन की तुलना में सन्निकट है . पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी 253.000 मील बताई  गयी जो  252710 मील की आधुनिक मापन की तुलना में सन्निकट है.
७. "pi का मूल्य  पहली बार  बौधयाना  द्वारा की गणना है, और उन्होंने ने उस अवधारणा को विकसित किया जो  बाद में  Pythagorean प्रमेय के रूप में जाना गया . वह यूरोपीय गणितज्ञों के पहले 6 वीं शताब्दी में इसअवधारणा की खोज की. इस को '1999 में मान्य' ब्रिटिश विद्वानों द्वारा किया गया.
८. जब कई संस्कृतियों के अनुयायी  5000 साल पहले  घुमंतू वनवासी थे, भारतीयओं ने  सिंधु घाटी की सभ्यता में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना की
९. महर्षि सुश्रुत सर्जरी के पिता है. 2600 साल पहले उन्होंने अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंगों को लगाना , अंग भंग होने,मूत्राशय के  पत्थरों और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह  की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किये . असंवेदनता का उपयोग अच्छी तरह से प्राचीन भारत में जाना जाता था. 125 सर्जिकल उपकरणों का  इस्तेमाल किया गया. शरीर रचना विज्ञान, शरीर विज्ञान, aetiology, भ्रूण विज्ञान, पाचन, चयापचय, आनुवांशिकी और प्रतिरक्षा की विस्तृत जानकारी भी कई ग्रंथों में पायी  जाती  है.
१०. दक्षिण भारत के लोग  आधुनिक मार्शल कला के मूल के संरक्षक, योग से प्रभावित और युद्ध के प्राचीन भारतीय विज्ञान (धनुर -वेद) और चिकित्सा (आयुर्वेदिक-) वेद से जुड़े हैं. कुंग फू का मूल एक बोधिधर्म नाम के बोद्ध भिक्षु के द्वारा दिया गया , जो500 ई  के आसपास भारत से चीन गए. 
११. गोविन्दस्वामिन ने  न्यूटन से 1800 सालपहले  न्यूटन गॉस क्षेपकः सूत्र की खोज की.
१२. वतेस्वराचार्य  ने  न्यूटन से1000 साल पहले   न्यूटन गॉस पिछड़ा क्षेपकः सूत्र की खोज की.
१३.चरक संहिता (3rd to 2nd centuryBC ) आंतरिक दवा पर एक आयुर्वेदिक पाठ है. यह आयुर्वेद के तीन प्राचीन ग्रंथों में  सबसे पुराना माना जाता है.
१४. सिंचाई तकनीक ४५०० BC में सिन्धु  घाटी की सभ्यता में विकसित हुई.
१५. वेदांग ज्योतिष, जो १२०० BC में लिखा गया , में ग्रहण, लीप वर्ष, खगोलीय रशिओं, चन्द्र/सूर्य ग्रहण का विस्तार से वर्णन किया गया. पांचवी शताब्दी में लिखित पञ्च सिद्धान्तिका में ग्रहण को रेखा चित्रों से दर्शाया गया है जो की पश्चिमी विद्वानों द्वारा केवल एक हज़ार साल पहले किया गया.
१६.  कश्यप  (६ BC )   ने  पहले प्रतिपादित किया गया था कि परमाणु  (Atom) पदार्थ की एक अक्षय कण है . सामग्री के अनुसार ब्रह्मांड  कण  से बना है. जब पदार्थ  विभाजित होता है तब हम एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं जहाँ विभाजन संभव नहीं है. और वह स्थिति परमाणु की होती है. 
१७.  आधुनिक भवन निर्माण पुरातन भारतीय वास्तु शास्त्र से प्रेरित है.
१८. संगीत के सातों स्वर वैदिक काल में पूर्ण रूप से मान्य किये गए. वेद, उपनिषद, श्रीमद भागवत, पुराणों और महाकाव्यों में स्वर संगीत के लिए कई संदर्भ हैं. कालिदास द्वारा रचित  विक्रमोर्यसिया  के चौथे अधिनियम में  द्विपदिका , जम्भालिका ,  खान्दधरा , कार्कार्ज , खंडाका , आदि जैसे विभिन्न अक्सिप्तिका  संगीत रचनाओं इस्तेमाल किया गया है 

यह  तथ्य वो तथ्य हैं जिन्हें संसार किसी न किसी रूप में मान्यता देता है. परन्तु हमारे वेद और धर्मग्रन्थ ऐसे ज्ञान से भरे पड़े हैं की हम आज तक उनका मूल्य ही न जान सके. बरसों की गुलामी ने हमारे धर्मग्रंथों को  मात्र महाकाव्य बना दिया. बात चाहे विमान की हों या अग्नि अस्त्र की हमारे धर्मग्रंथ ऐसी ही बातों से भरे पड़े हैं. चाहे पुष्पक विमान काल्पनिक हों, चाहे  राम  द्वारा  अग्नि बाण का संधान काल्पनिक हों पर एक बात तो हमें यह मानने पर विवश करती है की  पोराणिक हिन्दुओं की कल्पनाशीलता इतनी तो थी जिसे बाद के वैज्ञानिकों ने सच कर दिखाया.  . भारत ने गीता के रूप में संसार को जीवन सूत्र दिया. चाणक्य और विदुर द्वारा दिया गया नीतिशास्त्र किसी भी परिचय का मोहताज नहीं है. आधुनिक राजनीती विज्ञान चाणक्य और विदुर द्वारा प्रतिपादित किये गए सिद्धान्तों पर ही आधारित है. इसी प्रकार आधुनिक अर्थशास्त्र चाणक्य द्वारा लिखे गए अर्थशास्त्र पर आधारित और प्रेरित है. आधुनिक antibiotic दवाएं आयुर्वेद के रस शास्त्र से ही प्रेरित हैं. अंकगणितीय आपरेशनों जैसे  घटाव, गुणन, भिन्न, वर्ग, cubes और वर्गमूल आदि का  नारद विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है.
पोराणिक भारतियों की उपलब्धिओं को इक फेहरिस्त में शामिल करना लगभग असम्भव है.बरसों की गुलामी ने हमें हमारी प्राप्तियां सहेजने का मौका ही नहीं दिया. कई प्राप्तियों को घुसपैठियों  ने प्रदूषित कर दिया.कुछ दिन पहले एक समाचारपत्र में पढ़ा के अमेरिका १५० योग आसनों का पेटेंट करवानेजा रहा है. सभी को यह बात ज्ञात है के योग का सूत्र भारत के मह्रिषी पतंजलि के देन है. कभी अमेरिका हल्दी का पेटेंट करवाता है कभी तुलसी  का. हम तभी जागते हैं जब पानी के नाक के पास बहने लगता है. अब इसे राजनेताओं की असफलता कहें या हमारी , की हमारी विद्या जो की ५००० साल पुरानी है उसका श्रेय कोई ऐसी सभ्यता ले जाए जिसे पैदा हुए ५०० साल भी नहीं हुए, भारतियों के लिए शर्म की बात है. गलती हमारी है और इस गलती का फायदा दूसरे उठाते हैं. हम पश्चिमी संभ्यता के रंग में इतने रंगे है की हमें सावन के अंधे की तरह सब कुछ हरा दिखाई दे रहा है. हम योग को नहीं जान पाए लेकिन जब योग पश्चिम जा कर योगा हों कर वापिस आया तो हमें उसकी महानता का एहसास हुआ. हम रामायण को तब तक न समझ पाए जब तक की वो रामायणा हों कर पश्चिम से वापिस नहीं आया. स्वामी विवेकानंद की प्रतिभा तब तक छुपी रही जब तक अमेरिका वालों ने उन्हें स्वामी विवेकानंदा नहीं कहा. कुछ ऐसा ही हश्र हमने ओशो के साथ किया. ऐसा कई नाम इतिहास के गर्त में छुप गए जिन्हें पश्चिम जाने का मौका नहीं मिला. अगर कोई डॉक्टर भारत से अमेरिका जाता है तो उससे कई तरह के टेस्ट देने के लिए कहा जाता है जिसका साफ़ मतलब है की उन्हें हमारी योग्यता पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं लेकिन क्या ऐसा ही व्यव्हार अमेरिका से भारत आने वाले डॉक्टर के साथ किया जाता है या किया जा सकता है? हमें आज भी सफ़ेद चमड़ी देख कर कमतरी का एहसास होता है. डॉ हरगोबिन्द खुराना को नोबेल पुरुस्कार तब मिला जब उन्होंने अमेरिका जा कर अपना शोध किया. अगर किसी भारतीय मूल के आदमी को नोबेल मिलता है तो हमारे यहाँ दिवाली मनाई जाती है. क्यूँ ? जब वो काम कर रहा था तब हमने उसे मान्यता नहीं दी, जब वो भारत की नागरिकता छोड़ कर किसी और देश का नागरिक बन गया और पुरस्कार जीत लिया तो हमें याद आता है की यह तो हमारा ही भाई था. ऐसी कई बातों की लम्बी फेहरिस्त है, जिसे अगर यहाँ लिखा जाए तो मुझे शायद देशद्रोही कहना शुरू कर दिया जायेगा. प्रेमचंद की रंगभूमि के मुताबिक यह संसार सदियों से ऐसे ही चल रहा है और चलता रहेगा. और अगर आज के बाद कोई आपको यह कहे की भारत की विश्व को देन जीरो है तो गर्व से इस बात  को कहेइएगा "की हाँ, विश्व को भारत की देन जीरो है, क्यूंकि जीरो के बिना गिनती पूरी नहीं होती".
जय हिंद 
और जाते जाते इकबाल के शब्दों में 
वतन की फ़िक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है,
तुम्हारी बरबादियों के चर्चे हैं आसमानों में,
अब न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दुस्तां वालो,
तुम्हारी दास्ताँ भी न होगी दास्तानों में

Tuesday, June 29, 2010

समोसा सेवक बाबु राम

अगर इस समोसे वाली रेहड़ी का साइड पोज़ देखें तो लगता है के यह रेहड़ी किसी ऐसे भारत देश भगत की है , जिसे चीन से उतनी ही नफरत है, जितनी की एक आम 
आदमी को. अगर आप इस रेहड़ी का फ्रंट पोज़ देखें तो आप पायेंगे एक ऐसा शायर जो अपने टूटते हुए घरों से दुखी है और अपनी जन्मभूमि से दूर होने की टीस अभी तक उसके  ज़हन में कहीं बाकी है. यह हैं जनाब बाबु राम पहाड़िया . इसी नाम से अपने आप को बुलाना पसंद करते हैं. आपने समाजसेवक, गोसेवक और जल्सेवक तो सुने होंगे लेकिन इस आदमी को अगर फाजिल्का का समोसा सेवक कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. बाबु राम बताते हैं की कोई ३२ साल पहले वो कांगड़ा से अपना गाँव छोड़ कर सरहदी शहर फाजिल्का  काम ढूँढने आये थे. मंशा यह  थी के थोड़े  पैसे कमा कर वापिस गाँव जा कर ज़मीं खरीदेंगे और वहीँ के हों रहेंगे पर इस शहर ने इतना प्यार दिया की फिर यहाँ से जाने का विचार ही छोड़ दिया. दिन भर में अनगिनत समोसे बेचते हैं और अपने परिवार के लिए इज्ज़तदार रकम कमा लेते हैं. समोसे के रेट देखें तो लगता है के सरकार के मुह पर तमाचा मार रहे हों. पांच रुपए के तीन . यह भी रेट तब बढा जब महंगाई ने सुरसा जैसा मुह खोल कर हर किसी को निगलने की कोशिश की वरना रेट था एक रुपए का एक समोसा. रेहड़ी पर सेल्फ सर्विस का माहोल है. पैसे दीजिये और समोसा उठायिए पास में चटनी एक गागर है जो दिन में दो बार भरी जाती है उसमें से मन माफिक चटनी लीजिये. और प्यार ऐसा के सब  को अपना चाचा, मामा , अंकल, दादा सब यहीं मिल जातें हैं. पैसे खुले नहीं तो कोई समस्या नहीं अगली बार दे जाईएगा. रेट के बाबत पूछने पर बताते हैं की इस महंगाई ने सब का जीना मुश्किल कर रखा है. इनके ग्राहकों में सब से ज्यादा गाँव से शहर आने वाले दिहाड़ीदार मजदूर होते हैं जो गिने चूने पैसे घर ले कर जाते हैं. घर वापिसी पर जब पांच रुपयों के तीन समोसे मिलते हैं , तो मन खुश हों जाता है और जब उनके चेहरों की ख़ुशी देखते हैं तो कहते हैं के वो ख़ुशी ज्यादा पैसों के कमाने से कभी मिल ही नहीं सकती. फाजिल्का के हनुमान मंदिर के पास  १० साल से रेहड़ी लगा रहे हैं और पास की पोश कालोनी में भी उतने ही ग्राहक हैं जितने मजदूर लोग. सालासर के बाला जी के अनन्य भक्त हैं. किसी का दिल तो दुखाना कभी सीखा नहीं. कांगड़ा का ज़िक्र आये तो मन भर आता है और फिर कोई पहाड़ी लोक गीत गुनगुनाने लगते हैं. पर अगर आप इनकी पंजाबी सुन लें तो आप यह अंदाज़ा नहीं लगा सकते के यह जनाब पंजाबी नहीं हैं. बचपन में पिता जी से एक बात सुनी थी की पहाड़ियों जैसे प्यार से खाना या तो माँ खिलाती है या फिर पहाड़िया. इसी कहावत को चरितार्थ करते हैं बाबू राम. आप अगर किसी का घर पूछने के लिए भी रुके तो समोसा खाए बगैर आप आगे जा नहीं सकते.अगर त्यौहार के दिनहों तो जनाब की शरीक ऐ हयात भी इसी काम  में शरीक होती हैं. दोनों मियां बीवी सब के चेहरों पर खुशी देख कर खुश होते हैं. चीन से दुश्मनी  के बारे में बताते हैं के उन्हें चीन से तब से दुश्मनी है जब से ६२ की लड़ाई में चीन ने भारत की ज़मीं पर कब्ज़ा कर लिया था और सोचते हैं के अगर चीन इस बार  तीन गुना ताक़त से भी आये तो भारत का बाल भी बांका नहीं कर सकता. पहाड़िया नाम से अपनी पहचान बचाने की कोशिश और लोगों की सेवा करने के इस द्वन्द को शायद नमन भी नमन करे.

Friday, June 25, 2010

अपना अपना चाँद

बचपन की एक कहानी तो सब को याद है की एक ज़मींदार ने दूध पिलाने के लिए एक नौकर रखा. नौकर रात को आधे शुद्ध दूध में पानी मिला कर देने लगा, ज़मींदार को शक हुआ तो उसने नौकर पर नज़र रखने के लिए दूसरा नौकर रखा. अब दोनों नौकर आधा आधा दूध पीने लगे और रात को सोते हुए ज़मींदार की मूछों पर मलाई लगा देते और सुबह कहते की मालिक रात को आपने दूध पिया था सबूत के तौर पर मलाई मुछों पर लगी है. अब ज़मींदार ने तीसरा नौकर रखा की पहले वाले दोनों नौकरों पर नज़र रखी जा सके. तीसरा नौकर मलाई खाने लगा और तीनो सुबह उठ कर मालिक को बातों बातों में मनवाने लगे की हम तीनों ने रात को आप को खाने के बाद दूध दिया था . मालिक बेचारा क्या करता , नौकरों की बातों के बहकावे में आ गया. शायद यही कहानी है आज सारे देश की जनता की. पहले सरकारें मिलावटी दूध पिलातीं थीं, फिर मूछों पर मलाई लगाने लगीं और अब सब बातों बातो में.....................  इसी कहानी के कुछ अंश चरितार्थ होते दिखे जब एक पत्रकार ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से पूछा के फाजिल्का तहसील के गाँव में पीने का पानी ज़हरीला है. तो जवाब मिला के आपने हमें बताया है हम इस को जल्दी ही देखेंगे. क्या एक मुख्यमंत्री से इस उतर की आशा की जा सकती है वो भी तब के जब जनाब के खुद के बेटे इस गाँव के विधायक हैं?और चुनावी रैलियों  में गाँव की जनता से शुद्ध पीने के पानी के बारे में बड़े बड़े वादे कर के गए थे.  
पिछले दिनों फाजिल्का का यह  गाँव सभी अख़बारों की सुर्ख़ियों में रहा ' तेजा रूहेला' . मुद्दा था 'ज़हरीला पानी'. . भोगोलिक आधार पर देखें तो पता चलता है की सतलुज इस गाँव में आने से पहले पाकिस्तान परवेश करता है और फिर वापिस भारतीय सीमा में आता है. कुछ सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान से वापसी के समय इसमें कसूर की चमड़ा फैक्ट्रियों  का ज़हरीला अवशेष मिलता है जिससे ये पानी ज़हरीला हों जाता है और कुछ के मुताबिक यह दरिया का पानी लुधिआना के बुड्ढा नाला से आता है , जो की लुधिआना के उद्योगों की कारुजगारी है. कारण जो भी हों मसला है ' ज़हेरीला पानी'. लोग अपंग हों रहे हैं, कुछ बच्चे अपंग पैदा हों रहे हैं,, जवानों की सीढ़ी एंट्री बुढापे में है. आज़ादी के ६० साल बाद भी हम पीने के पानी के लिए पकिस्तान को कोस रहे हैं. पंजाब प्रदूषण रोकथाम बोर्ड की मानें तो पंजाब में सब ठीक है, सतलुज का प्रदूषण हिमाचल परदेश के उद्योगों से हों रहा है. पंजाब कृषि विश्वविधालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक बुड्ढा नाला के सतलुज में मिलने से पहले सतलुज का पानी बिलकुल ठीक है पर जैसे ही बुड्ढा नाला लुधिअना में सतलुज से मिलता है इसमें मिल जाते हैं ज़हरीले अवशेष. गाँव तेजा  रूहेला  के लोगों से हमदर्दी प्रकट करने के लिए आने वाले लोगों में कुछ सेलेब्रिटी थे, कुछ ऍन जो ओ , कुछ राजनेता और कुछ टीवी चैनल. सब सब आपनी और से हमदर्दी बयां कर गए और गाँव वालों का दर्द दुनिया को दिखा गए. दर्द का कोई चेहरा नहीं होता , दर्द तो आग़ाज़ से अंजाम तक केवल दर्द ही होता है. ग़ैर सरकारी संस्थायों वाले पानी के सेम्पल भर के ले जा रहे हैं के हम इसे टेस्ट करवाएंगे. क्या बीमार और अपंग लोगों की उपस्थति अभी भी टेस्ट की मोहताज है. कुछ लोग भोले भाले गाँव वालो को बता रहे हैं के आपके पानी में "सुस्पेंदेद सोलिड्स ' जिससे पानी ज़हरीला हों रहा है. और किसी ने बिलकुल दूर की कौड़ी फ़ेंक दी की इस में पाकिस्तान का हाथ है. चाहे सुस्पेंदेद सोलिडस हों या यूरानियम  हों या कुछ और इस बात से कुछ फरक नहीं पड़ता. क्यूंकि एक बात तो पानी की तरह साफ़ है के पानी ज़हरीला है फिर इस पर इतना नाटक क्यूँ. मुख्यमंत्री कह रहे हैं के देखेंगे. कब देखेंगे? जब गिद्दढ़ बाहा के लोगों को १० पैसे प्रति लीटर मिल सकता है तो यहाँ क्यूँ नहीं. जिस तरह केंद्र सरकार के लिए सारा हिंदुस्तान दिल्ली में बसता है उसी तरह पंजाब  सरकार के लिए शायद सारा पंजाब भटिंडा और आस पास ही बसता है. सब आ जा रहे हैं, कुछ ग्लोबल वार्मिंग के ठेकेदार हैं, कुछ खेती सँभालने वाले और कुछ चेहरा बेचने वाले और कुछ राजनेता . सब अपनी अपनी तरह से समस्या का चिंतन कर रहे हैं. पर एक चीज़ पर किसी का ध्यान नहीं है ............ और वो है 'हल' . कोई 'हल' पर चिंतन नहीं कर रहा है. सब समस्या पर केन्द्रित है हों भी क्यूँ न इसी से तो दुकानदारी चलती है. समस्या बढ़ाएंगे नहीं तो लोग जानेंगे कैसे के हम भी समाज के  कुछ उन ठेकेदारों में से हैं जो राजनेता नहीं हैं. हम उनकी तरह आपकी समस्या दूर तो नहीं करेंगे पर हाँ उस पर नमक ज़रूर लगा सकते हैं. हम आपके पास आयेंगे , फोटो खिचवायेंगे और फिर सरकार से ग्रांट ले कर एक और तेजा रूहेला ढूँढने के मिशन पर चले जायेंगे. और अगर आप उस ग्रांट से अपने इलाके में कोई आर ओ सिस्टम की आशा कर कर रहे हैं , तो कृपया किसी ग़लतफहमी में मत रहें क्यूँकी इस पूरे घटनाक्रम में हम अपना अपना चाँद ले कर जा रहे हैं और आपकी बात हम सरकार  तक पहुंचा देंगे. 

वह कहते हैं हुकूमत चल रही है
मैं कहता हूँ हिमाक़त चल रही है

उजाले जी हुज़ूरी कर रहे हैं
अंधेरों की सियासत चल रही है

Sunday, May 9, 2010

प्याऊ


भिखारियों के नाम नहीं होते. अगर होते हैं तो शायद उनको भी याद नहीं होते. हर कोई उन्हें अम्मा आगे चल, बाबा आगे चल कहते हैं और इस तरह सभी नर भिखारी बाबा और मादा भिखारी अम्मा हों जाती हैं. ऐसा ही एक भिखारी था वो भी. नाम पूछने पर हमेशा बाबा बताता. यह बाबा थोडा हट-के टाइप भिखारी था. स्टेशन के सामने वाला फूटपाथ उसकी मिलकियत समझा जाता था, जिसमे से उसने बहुत से भिखारिओं को जगह बेच दी थी और खूब पैसा कमाया था और अपने लिए उसने बहुत ही चुन के जगह रखी थी. इस जगह से वो हर दानदाता को सब से पहले नज़र आता था. एक दिन इक दानी सज्जन ने पुराना डनलप का पुराना गद्दा ला कर उसे दिया तो उसने उस गद्दे को बीच में से मोड़ कर उसकी पुष्ट तयार कर ली थी. अब बाबा सारा दिन बैठे रहते. कुछ पैसे फूटपाथ बेच कर आये हुए थे , कुछ जगह का किराया आता और खाने पीना की सब ज़रुरियात दानी सज्जन पूरा कर देते. अब बाबा का गद्दा शाम की चौपाल बन गया. बाबा ने थोड़ी बहुत साहूकारी भी शुरू कर दी थी. बाकि के किरायेदार या पडोसी सुबह धंधे पर जाने से पहले उससे कुछ खुल्ले पैसे ले कर जाते और शाम को सूद समेत वापिस कर देते. ले दे कर यह आदि सभ्यता के बैंक का ही एक रूप दिखता था. शाम को सब भिखारी उसे शहर की खबरें सुनाते और बाबा उन्हें स्टेशन की. पर इस चौपाल का एक नियम था के कोई बाबा के गद्दे पर नहीं बैठ सकता था क्यूँ की बाबा साहूकार  थे और बाकि उनकी प्रजा.
"अपने दिन बहुत मजे में कट रहे हैं भाई" बाबा ने कहा.  खाने पहनने को भगवान भेज देता है. बस एक पानी का मुद्दा है वो ज़रा चल कर सामने नलके से पीना पड़ता है.
"इतना तो चलना भी चाहिए बाबा"
"ओये तू डॉक्टर है. अबे अपने काम से काम रखा कर, वरना कल से सूद पर पैसा नहीं मिलेगा", हाँ, तो मै कह रहा था के गर्मियों की दिक्कत है. ठंडा पानी नहीं मिलता. भगवान करे कोई ठन्डे पानी का जुगाड़ हों जाये तो भगवान का दिया सब कुछ हों जायेगा."
यह नलका स्टेशन के बाहर है. फूटपाथ  के भिखारी, राहगीर, स्टेशन के मुलाजिम और यात्री सब की प्यास बुझाता था . बहुत भीड़ लगी रहती. गाडी छूटने के समय तो कई यात्री प्यासे ही सफ़र पर निकल पड़ते. पर इसमें नलके का कोई दोष नहीं था, वो तो बेचारा सुब्ह से शाम तक काम में लगा रहता अगर कोई उसके फल से अछूता  रह गया तो उसमें बेचारे नलके का क्या दोष.

"मैं यह कह रहा था सेक्टरी साब, के वो जो स्टेशन के बाहर वाला नलका है न उसकी बग़ल में एक कमरा बनवा के प्याऊ बनवा देते हैं , एक आदमी रख देते हैं और दो टब, दो जग और कुछ गिलास. गर्मियों में लोगो को कम से कम पानी तो ठंडा मिले , इन सरकारों के भरोसे रहे तो कुछ भी नहीं होगा" प्रधान जी ने अपना मशवरा दिया.
"ठीक है, विचार अच्छा है. इतवार की मीटिंग में यह मुद्दा पास करवा लेते हैं. बहुत पुण का काम है, और बाकि संस्था के पास पैसों की कोई कमी नहीं है" सेक्टरी ने प्रधान जी की बातों का उन्मोदन करते हुए कहा.
"तो मैं सब को फ़ोन कर देता हूँ, इतवार की मीटिंग के लिए."
"नहीं प्रधान जी, मीटिंग की काल तो सेक्टरी की तरफ से जानी चाहिए."
"जैसे आपकी इच्छा, हमें तो मीटिंग से मतलब है"|

इतवार की मीटिंग में बहुत गहमा गहमी थी. सब उत्साहित थे के संस्था एक पुण्य के काम में भागिदार बनने जा रही है. प्रधान जी और सेक्टरी के लम्बे लम्बे भाषणों और बाकी मेम्बरान की इस्स्लाह से सारा प्रस्ताव ध्वनीमत से पास कर दिया गया और अगले ही दिन प्याऊ बनाने की कार्रवाई शुरूकर दी गयी. रेलवे से नो ओब्जेक्शन लिया गया और नगरपालिका से एक गैर क़ानूनी पानी का कनेक्शन.
"हेल्लो , प्रधान जी, मैं गुप्ता ईंट वाला बोल रहा हूँ. सुना है प्याऊ बन रहा है. भाई ईंटें तो हम ही देंगे और आपको भी खुश करेंगे."
"अरे गुप्ता जी, यह को कहने की बात है. कहें तो प्याऊ का सारा ठेका आपको दे देते हैं पर ३० टका लेंगे"
"ठीक है पर काम हमारी मर्ज़ी से होगा, आप बिल पास करवा देना. आपका ३० टका पक्का."
"ठीक है जी, आप काम शुरू करें"

"अरे प्रधान जी, यह क्या ठीक आपने गुप्ता को दे दिया , मेरा साला भी तो यही काम करता है" सेक्टरी ने कहा
"कोई बात नहीं सेक्टरी साब, उसको बर्तनों का ठेका दे देंगे और वो आपके नौकर का बेटा है जो उसे वहां पानी पिलाने की नौकरी भी देंगे, आप नाराज़ मत हुआ कीजिये."
"ठीक है."

दो महीने बाद प्याऊ का उदघाटन बड़े जोर शोर से किया गया. सब से ज्यादा बाबा को खुशी हुई. शाम को चौपाल में सब उसे घेरे कहने लगे "बाबा, भगवान ने आपकी सुन ली अब तो गर्मियों में ठन्डे पानी का टंटा भी   खतम हों गया."
"अरे भगवान क्या करता यहाँ पे, अपन ने प्रधान ग को कहा. अपन को बहुत मानते हैं. यह गद्दा भी वो ही दे गए थे. हमने कहाः तो कहने लगे , बाबा यह भी कोई काम है इस गर्मियों में ही लो, और आज काम भी हों गया. तुम में से किसी को प्रधान जी से कोई काम हों तो मुझसे कहना. चुटकी में करवा दूंगा.
                          
                                                           -2-

"हेलो , सेक्टरी साब, ज़रा फ़ोन तो कीजये, परसों इतवार को मीटिंग बुलवा लें|"
"हाँ जी प्रधान जी कर देता हूँ. पर वो मेरे साले का बर्तनो का बिल तो पास करवा दें|
"वो भी हों जायेगा. हम आपका इतना ख्याल रखते हैं और आप एक छोटे से बिल के पीछे नाराज़ मत हुआ कीजिये"|
"चलिए, मैं फ़ोन कर देता हूँ|"
मीटिंग के दिन फिर गहमा गहमी का माहोल था. प्रधान जी कलफ किया जारी वाला कुरता पजामा  पहने स्टेज पर विराजमान थे. सब को चुप रहने का इशारा कर के उन्होंने कहा " आदरनीय सदस्यों, जैसा की आपको मालूम है, हमने जो स्टेशन के बाहर प्याऊ बनवाया था वो पूरी तरह से कामयाब रहा है. अब हमने सोचा है के उस प्याऊ में एक एल्क्ट्रोनिक वाटर कुलेर लगवा देते हैं. बिजली बोर्ड के अधिकारिओं से बात हों गयी है वो हमें एक कुण्डी कनेक्शन दे देंगे.|

थोडा खंखार कर प्रधान जी ने अपनी बात आगे बढाई " प्याऊ पर लगे दान पात्र में संस्था के पास काफी पैसे जमा हों गए हैं इससे हमें वाटर कुलेर लगाने में कोई समस्या नहीं आएगी."

"प्रधान जी , वाटर कूलर मेरी दूकान से ही जायेगा न." शर्मा जी बोले

"बिलकुल शर्मा जी, आपसे बाहर थोड़े ही हैं हम"|

"और बिजली का सामान मेरी दूकान से " एक गंजे से वर्मा जी ने बीच में अपनी बात घुसेडनी चाही.

"नहीं वर्मा जी, आपको सेवा का मौका अगली बार देंगे, यह सामान इस बार नगरपालिका के प्रधान जी के जीजा जी की दूकान से आएगा." प्रधान जी न माफ़ी मांगने वाले स्वर में कहा

"पर मेरे नौकर के बेटे का क्या होगा, जो प्याऊ पर नौकरी करता है" सेक्टरी बीच में बोला

"अरे भाई उसे मैंने सेठ जी के पास ड्राईवर लगवा दिया है"




कुछ दिन बाद उस प्याऊ में एक अदद वाटर कूलर ने यात्रियों, मुलाजिमो और भीखारियो को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी. सब खुश थे. बाबा के भिखारी बाबा की पहुँच से प्रभावित हों कर उसे अपना सरदार मानने लग गए.

"अब ऐसा हैं के प्रधान जी मेरी राय के बिना तो यह ठन्डे पानी की मशीन लगवाने से रहे" बाबा ने भिखारिओं से कहा|
"तो क्या प्रधान जी ने तुमसे राय ली थी" एक वृद्ध भिखारी थोडा आगे हों कर बोला
"और नहीं तो क्या. मुझसे पूछने लगे के मशीन लगवा देता हूँ तू इन भिखारिओं से आठ आने एक बर्तन के ले लिया करना" बाबा ने पुष्ट से पीठ टिकाते हुए कहा | "मैंने कहा राम राम प्रधान जी, आगे भगवान को मुह दिखाना है, आठ आने तो बहुत ज्यादा हैं. १० पैसे ठीक रहेंगे. भगवान आप को सब कुछ दे पर इन गरीबो का कुछ सोचो तो मेरे कहने पर मान गए के चलो १० पैसे बर्तन के ले लेना"

"ठीक है हम कल से आपको १० पैसे बर्तन के देंगे" सभी भखारी एक साथ बोले|
"ठीक है अब तुम जाओ, मेरे पूजा करने का वक्त हों गया है" बाबा ने आँखें बंद करते हुए कहा|
                                                           -३-

"हेलो , सेक्टरी साब, ज़रा फ़ोन तो कीजये, परसों इतवार को मीटिंग बुलवा लें|"
"अरे प्रधान जी मीटिंग छोडिये, काम बोलिए| आप तो हर बार मलाई खुद खा जाते हैं और दूध दूसरों को पिला देते हैं हमें तो तलछट भी नहीं मिलती"|
."अरे भाई, काम तो यह है के स्टेशन के बाहर के प्याऊ पर भीड़ ज्यादा है . सोच रहा हूँ एक वाटर कूलर और लगवा दें तो कैसा रहे"|
"प्रधान जी बात उम्दा है. पर इस बार सब मेरा होगा. मेरे चाचा जी ने अमेरिका से पैसे भेजे है किसी सामजिक काम के लिए. उन से वाटर कूलर लगवा कर बिल आपसे पास करवाना है और बाकी हम आपस में देख लेंगे.
"ठीक है सेक्टरी साब. आप तो भगवान हैं जैसा आप कहें"|
"पर वो नलका बीच में आएगा"
"तो उखाड़ दो"
"ठीक है , मैं आज ही उखाड़ देता हूँ आदमी भेज कर. और किसी को इस बात का पता न चले की क्या हों रहा है"|

"अरे बाबा, वो नलका तो उखाड़ दिया उन्होंने" एक भिखारी बाबा को सूद देते हुए बोला
"हाँ, वो प्रधान जी आये थे तुम्हारे ठन्डे पानी के पैसे लेने. बोले एक मशीन और लगवा देता हूँ" बाबा ने रुपए गिनते हुए कहा." तू ऐसा कर वो नलका है न, उसे उठा ला इधेर, पाइप तो वो साथ ही ले गए.
"उसका क्या करोगे"
"अरे मेरा पुराना दोस्त है, उसे सिरहाने की तरह नीचे रखूँगा, बुरे दिनों का साथी है मेरा"
"ठीक है"

                                                           -४-

"अरे सेक्टरी साब, वो पुराने वाला वाटर कूलर नहीं चल रहा. अभी ६ महीने ही तो हुए हैं"
"अरे प्रधान जी, आपने ३० टका खाया था, आप देखो, अपना तो सही चल रहा है"
"यह क्या बात है मुह सम्भाल के बात करो"
"तो इसमें गलत क्या है"
"क्यूँ तुने भी तो खाया है दुसरे में"
"फिर क्या हुआ तुमसे ज्यादा तो नहीं है"

"चलो छोडो, और हाँ वो बिजली बोर्ड वाले आकर जुरमाना ठोक गए हैं. बोल रहे ते सरकार बदल गयी है ऊपर से आर्डर आया है हम कुछ नहीं कर सकते" प्रधान जी ने कहा
"प्रधान जी, पानी वाले केस में भी कुछ ऐसा ही है" सेक्टरी ने कहा
"तो फिर क्या करें , बिना पानी बिजली के तो वाटर कूलर चलने से रहा"|
"तो ठीक करवा के बिल डाल दो. बाकी देख लेंगे"|
                                                                 -५-

गाड़ियाँ अपने समय से प्यासे यात्रिओं को लेकर  रवाना  हो रहीं हैं. वाटर कूलर बंद हो चुके हैं. प्याऊ की दीवारें गिरती जा रही हैं. भिखारिओं ने बाबा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और अपना एक नया सरदार बना कर बाबा को प्याऊ की साथ वाली दिवार की तरफ भेज दिया है. बाबा सारा दिन टूटे हुए नलके से टेक लगा कर उदास बैठा हुआ भगवान को कोसता है. प्रधान जी और सेक्टरी ने अगली मीटिंग में शहर के गरीब इलाकों में पानी की कमी को दूर करने के लिए नए नलके लगवाने के प्रस्ताव को पास करवा लिया है और वर्मा जी इस सेवा का मौका पाकर कल एक पार्टी दे रहे हैं. आप सब सादर आमंत्रित हैं.


                                                          

Tuesday, April 13, 2010

रेत

                                                                       -१-
 "ओ भैन ________________________" मैं चिल्लाया. "दीखता नहीं है तेरे को"
पीछे से किसी ने कान पकड़ा , घसीटा और सीधा बाथरूम के पुराने मैले रंग के दरवाज़े को खोल के अन्दर धकेल दिया. चिटकनी लगने की आवाज़ आई तो आवाज़ से पहचाना के ये तो ताया जी थे. यानी घंटा बैठेंगे और माँ पिताजी में किसी में इतनी हिम्मत नहीं होगी और मैं एक डेढ़ घंटे के लिए बंद. राजू चला गया तो मेरे पांच कंचे डूब जायेंगे. पानी, चाय की आवाज़ लगने लगी. अभी पंडित जी भी आयंगे गली में, गोलगप्पे वाले, वो भी खिलाये जायेंगे.औरमैं एक कैदी की तरह अन्दर पड़ा रहूँगा. कुछ तो करना पड़ेगा.


आवाज़ भर्रा कर बोला: " ताया जी मैंने कुछ नहीं किया. वो तो राजू ने मेरा रेत का घर तोडा था तो मैं उससे लड़ रहा था. मैंने कुछ नहीं किया. आई ऍम सॉरी , मुझे बहार निकालो".


किसी ने न सुनी. सब बैठे रहे . बाहर  पंखे की आवाज़ आई तो अपने बदन पर भी पसीने का आभास हुआ तो दिल और बैठने लगा. अब तो गए हाय, गर्मी.
"सुलेखा की शादी में सब को बीस बीस हज़ार रुपए देने हैं............" यह ताया जी की आवाज़ थी.
"मैं कल ही बैंक से निकल दूंगा" पिता जी बोले.
बीस हजार बैंक से निकलेंगे. कल मैंने कंचो के लिए पैसे मांगे थे तो पिता जी ने कहा था के अभी तनख्वाह नहीं मिली. ताया जी बहुत गंदे हैं. मेरे कंचों के लिए पापा के पास पैसे नहीं और यह शादी के लिए बीस हजार ले जायेंगे. मैं बीस हजार के कंचों का हिसाब लगाने लगा. उँगलियों ले पोरे कम पड़ गए, और इतना बड़ा पहाडा तो अभी स्कूल में पढाया नहीं. शायद अन्दर वाला कमरा पूरा भर जायेगा. मैं कंचों के खजाने पर खुश होने लगा. तभी चिर परिचित बूटों की आवाज़ ने मेरे विचारों के तारतम्य को तोडा. ताया जी जा रहे हैं. उनके जाते ही माँ ने दरवाज़ा खोला, मैं भाग कर बाहार आया. राजू जा चूका था. मैं उसके घर गया , उसकी माँ ने कहाँ वो अपने बाप की रेहड़ी पर गया है. रात को आएगा. मुझे पता था, वो साला है ही चोर. हर बार मेरे कंचों को ठग कर ले जाता है. अगर आज ताया जी ने मुझे बंद न किया होता तो मैं उस भेन_______ से सरे कंचे जीत लेता.
मैं फिर से ताया जी कोसने लग जाता हूँ. इतना बड़ा नुक्सान सिर्फ उनकी वजह से हुआ है.


                                                                  -२-


"मुझे नोट बंधने वाली टाई ले के दो, मैं यह बच्चों  वाली रेडीमेड टाई नहीं पहनूंगा". मैंने घर में घुसते ही शोर मचाना शुरू किया.
"अभी नहीं, एक तारीख को जब तनख्वाह मिलेगी तब. उससे से पहले मत मांगना".
"क्यूँ २० रुपए की टाई के लिए अभी बीस दिन इंतज़ार करूँ. मेरे सब दोस्तों ने ले ली है और वो मेरा मजाक उड़ाते हैं. मैं फिर कल से स्कूल नहीं जाऊंगा. एक तारीख के बाद ही जाऊंगा."
एक झन्नाटेदार थप्पड़ मेरे नाज़ुक गालों पर पड़ा. आंसू ढलके और मैं बाहर वाले मंजे पर लेट गया. रोते रोते नींद आई और आँख खुली तो शायद ९ बज रहे थे. दूरदर्शन की चिरपरिचित ध्वनि जो समाचार बुलेटिन ख़तम होने बजती है बज रही थी..
माँ ने खाना रखा तो मैंने मूंह फेर लिया. माँ भी चली गयी. किसी ने खाने के लिए नहीं पूछा. मास्टर जी कह रहे थे, सप्तऋषि गर्मियों में साफ़ दिखाई देता है और मैं तारों में सप्तऋषि ढूँढने लग जाता हूँ. पेट कुलबुलाने लगा है. भूख लग रही है. शायद सप्तऋषि की तरफ ध्यान लगाने से भूख कम लगे. भूख को तो लग्न है , वो लग रही है. कैसे माँ बाप हैं, बच्चे को खाना नहीं दे रहे. एक बीस रुपए की टाई ही तो मांगी है कौन सा जहाज मांग लिया है. कल गौरव के पास ५०० रुपए की घडी थी. वो आमिर आदमी है, आढ़त का काम है उसके बाप का. भाई मेरे, पिछले जन्म में गौएँ दान की होंगी तभी अमीर घर में जनम मिला है. काश अपने भी ठाठ होते, पर यहाँ तो खाना ही नसीब नहीं हो रहा. घड़ियाँ क्या ख़ाक मिलेंगी. मैं फिर पेट पकड़ कर हिलता जुलता हूँ, खांसी करता हूँ. तभी माँ ने आकर सिरहाने खाना रख दिया और चली गयी. मैं मूंग की दाल (जो मुझे कभी अच्छी नहीं लगी) के साथ रोटी खा कर पानी पी पी कर माँ पिता जी को कोसता हूँ और सोने की कोशिश करने लगता हूँ.


                                                                        -३-
"छोड़ यार, वो प्रोफेस्सर बहुत बोर करता है. कल लगायेंगे उसकी क्लास". मैं सुमित की बाजु पकड़ कर घसीटते हुए बोलता हूँ.
"हाँ यार चल, बाहर चाय पीते हैं". उसने भी मेरे प्रस्ताव को हरी झंडी देते हुए कहा.
"दो चाय बना ओये".
"तुने कभी सिगरट पी है". सुमित एक लड़के को सिगरट पीते हुए देख कर बोला.
"हाँ एक बार. पांचवी में था, बुआ के घर जा के पी थी. चोरी की थी एक अट्ठनी." मैं बोला
"आज पियें" उसने कहा
"नहीं यार छोड़. आदत पड़ जाती है सुना है" मैंने इनकार में सर हिलाया.
"यार एक बार में थोड़ी आदत पड़ जाएगी"
"चल ले ले एक. आधी आधी पी कर देखते हैं"
सिगरट ले ली गयी है और हाई blood प्रेशेर के साथ उसे सुलगाने का उपक्रम शुरू किया जाने लगा. सुट्टा खिंचा और खांसते खांसते आँखें लाल.
"अरे , बुधुराम सुट्टा ऐसे थोड़े खींचते हैं. आरामस इ पहले धुआं मूंह में भरो, फिर सीईईई की आवाज़ के साथ उसे गले से उतारो, फिर देखो जन्नत का नज़ारा."
" ला दे यार."
मूंह में धुआं बहरा, सीईईई की आवाज़ के साथ गले से उतारा. फिर आया जन्नत का नज़ारा. चक्कर आये, मज़े वाले. चाय का स्वाद बदल गया. चाय वाले के साथ मजाक शुरू. "ऐसे ही भूले रहे यार इसे, ये तो वाकई जन्नत का नज़ारा हैं". मैं मदमस्त आँखों से बोला.
"चल यार आज फिल्म देखते हैं" सुमित ने कहा.
"वो लेक्चर" मुझ पर अभी भी नशा तारी था.
"एक दिन से कोई फरक नहीं पड़ता, वो सोढ़ी को देख साला कभी क्लास में नहीं आता. एक दिन हम भी मज़े लार लें"
सिनेमा के बाहर टिकेट ले रहे थे और बाल सुलभ चंचलता के साथ मजाक भी.
"आज कॉलेज नहीं गए , बेटा" पीछे से किसी ने पूछा.
मुड कर देखा तो होश गम. अंकल थे, पापा के साथ दफ्तर में हैं.
"वो प्रोफेस्सर साहब बीमार हैं, लेक्चर लगा नहीं इसलिए फिल्म देखने आ गए."
शाम को घर जाने में भी डर. अन्दर घुसते ही गालिओं के परमाणू अस्त्र चलने लगे. ऐसा लग रहा था के मैं जैसे फिल्म नहीं किसी का क़त्ल देख कर आ रहा हूँ.
खाना न मिलना था, न मिला. यह सब अंकल की बदमाशी है. उन्होंने ही घर में कहा होगा. उनको क्या लेना देना है मुझसे. अपने घर में मस्त रहे. खुद का बेटा आर्ट्स में है, उसको होशिआर बांयें. हम साइंस वालो से ऐसे ही दुश्मनी. कोई बात नहीं अंकल जी, कल को मेरा टाइम भी आएगा. दिमाग ने मुक़दर का सिकंदर फिल्म  वाला dialogue   मारा. आज से कभी रस्ते में मिल अगये तो नो नमस्ते नो सत श्री अकाल . आपजी पहले हमारी शिकयत लगाओ , इज्ज़त बाद में करवा लेना.
"चाय पीने चलें" सुमित बोला
"नहीं यार, कल अंकल घर शिकायत ले के पहुँच गए"
"चल; एक सिगरट पी के क्लास में आ जाते हैं"
"नहीं यार तू पी लेना , मैं तेरे साथ चलता हूँ."
"ठीक है"
"एक सिगरट ला ओये, और पानी भी " सुमित चिल्लाया
पानी के साथ एक कैप्सूल गटका और बोला"अच्छी चीज़ है यार, लेक्चर कैसे निकल जाता है पता नहीं चलता. तू भी खा ले एक "


" नहीं यार सिगरट तक ही ठीक है" मैंने इनकार किया
"तेरी मर्ज़ी"
"चल चलें" वो उठेते हुए बोला.
रास्ते में एक सज्जन मिले. उनको कार में वो भी बैठा और मैं भी. नहर के किनारे बैठ कर बिएर पीने का क्या मज़ा है आज पता चला. पर परमात्मा को मेरी ख़ुशी पहले कौन सा पचती थी जो आज पचेगी. वोही अंकल मिल गए, पर कोई बहाना नहीं मिला.
घर पे खाना भी नहीं मिला. एक हफ्ता घर में जंगी कैदी की तरह कटा. एक हफ्ता अंकल जी को कहाँ, कैसे, कब और किसके साथ पीटना है यह प्लानिंग की. फिर उसके बेटे को रंगे हाथ पकड़ने ने की. पर हम से कोई अच्छा काम हुआ है जो इस बार होगा. अंकल की तो___________________________________.


                                                                         -४-


"बधाई हो यार."
"शुक्रिया" मैंने नफीस लहजे में जवाब दिया.
"सब से पहले मैदान मर लिया, दोस्तों में से"
"बस यार ऐसे ही है".
शादी तय होगी तो भाई बधाई तो मिलेगी. नौकरी भी लग गयी है, अब एक कमाऊ बीवी भी आएगी तो ऐश हो जाएगी. तो राम राम करते शादी का दिन भी आया. शादी हुई. जैसे सब की होती है अपनी भी हुई. मधुमास भी मनाया, जैसे सब मनाते हैं. शराब भी पी, जैसे सब पीते हैं. अब को शिकायत नहीं लगेगी घर में. अब बड़े हो गए हैं. बीवी भी आ गयी है. अब तो समाजिक रूप से हम स्वीकार्य हो गए हैं.
"आप सिगरट पीते हो". पत्नी बोली
"हाँ"
"पहले नहीं बताया, यह गलत बात है. अब छोड़ दो"
"हाँ जल्दी ही छोड़ दूंगा"
रोटी के बाद तो पीनी पड़ेगी, काम नहीं चलता ऐसे. तो शिमला समझौता रात की एक सिगरट पर तय हो गया.
"आप तो रोज़ ही पी कर आने लगे"
"तो क्या हुआ, कौन सी ज्यादा पीता हूँ. दो पेग ही पीता हूँ"
"सेहत तो बिगाड़ते ही हैं. छोड़ दो"
"जल्दी छोड़ दूंगा"
तो इस बार लाहोर समझोता, महीने में एक बार पीने पर तय हो गया.,
पीना तो नहीं छूटा पर हाँ घर में बताना छूट गया. पर बकरे की मान आखिर कब तक खैर मनाएगी. एक दिन तो पकडे ही गए. "समझोते वाली तो कल पी थी.. फिर आज किस लिए  ."
"दोस्त मिल गए थे, धक्का कर दिया उन्होंने"
"यह मरजाने दोस्त, अपना तो घर खराब करते हैं, मेरे घरवाले को साथ में ऐसे मुफ्त में."
मैं मन में सोच रहा हूँ यार बिगड़ने तो में अकेला ही गया था यह भली मानस अब मेरे दोस्तों से शीत युद्ध शुरू कर देगी. बेचारे दोस्त. पर दोस्त तो होते ही कुर्बानी के लिए हैं. खाना नहीं बना है, और एक हफ्ता संग्राम जारी रहेगा. मैं पानी पी पी कर रात भर पत्नी को कोसता हूँ.


                                                                         -५-
"बधाई हो यार. बेटा हुआ है"
"शुक्रिया"
"बेटा पहले होना चाहिए . आदमी की सारी चिंता खत्म हो जाती है." एक बुढ़िया बोली
"हाँ, खानदान ताँ ही चल्लू " एक बुज़ुर्ग महिला ने बात को आगे बढ़ाते हुए बोला
"बिलकुल बाप पे गया है" एक स्वर और उभरा.
"हाँ, आदतें बाप पर न जाएं"
यह बात सिं कर मेरे भी कान खड़े हो जाते हैं. सब अपनी बात रख रहे हैं. मैं सोच रहा हूँ कब ये लोग जायें और मैं अपना कोटा निकालूँ. शराब पिए  बिना तो नींद नहीं आएगी.
"अब तो बैठने लगा है"
"दांत भी जल्दी निकलेगेया."
चलो अच्छा है. बच्चे ठीक हों तो माँ बाप परेशां नहीं होते."
जितने मुह उतनी बातें.
                                                                          -६-
बेटा बड़ा हों गया है. गली के कुछ लड़कों के साथ खेलता है. मैं उसे उंच नीच समझता हूँ.
"ओ भैन ________________________" बेटा  चिल्लाया. "दीखता नहीं है तेरे को"


मैं बेटे का कान पकड़ कर उसी मैले दरवाज़े को खोल कर बाथरूम में बंद कर देता हूँ.

Tuesday, November 24, 2009

मैं भगत सिंह पंजाबी बोल रहा हूँ!


भगत सिंह: हेलो, मैं भगत सिंह पंजाबी बोल रहा हूँ। और क्या हाल हैं बाबु मोशाय।
बटुकेश्वर दत्त: हाँ भाई पंजाबी, क्या हाल है तुम्हारे। मोबाइल नम्बर बदल लिया बताया नहीं।
सिंह: बस यार ऐसे ही। कोई पंगा पड़ गया था इधर पंजाब में और सुना।
दत्त: तू सुना क्या चल रहा है आज कल।
सिंह: बस यार वोही ठेके दिला देते हैं लोगों को और वोही बसें चल रही है ४० -५०।
दत्त: ४०-५० बसें! यार इतने परमिट कहाँ से लाते हो।
सिंह: परमिट काहे का। किसी ने मरना है क्या जो भगत सिंह पंजाबी की बस रोके। जब से साले स्कॉट को गड्डीचढ़ाया हैं न अपना तो इधर मस्त काम है। देख कर सलाम ठोकते हैं इधर।
दत्त: और अपना सुखदेव कहाँ हैं आज कल।
सिंह: मिला नहीं यार। उसने लाला जी के साथ मिल कर एक खत्री बचाओ आन्दोलन शुरू किया था, आज कललाला जी ढीले हैं तो सरदार बना घूमता है। काम तो उसका भी वोही है। सुना है रेत वेत की खानों पर क़ब्ज़ा है आजकल। धींगरा भी उनके साथ है, अमृतसर संभाल रहा है आज कल।
दत्त: और अपना वोह मराठा शेर?
सिंह: कौन राजगुरु! अरे वोह तो उधर महाराष्टर में है आज कल। मराठी पार्टी बनाइ है। एक दो बार आजाद के पीछेपड़ गया था, के जाओ यह महाराष्ट्र हमारा है, तुम यू पी वालों का क्या काम यहाँ। बिस्मिल और आजाद भेस बदलकर भागे वहां से। आके बोलते जान बची तो लाखों पाये। हहहहहाहह्हहहहाहा
दत्त: और अपना अशफाक कहाँ है आज कल।
सिंह: होगा कहीं। अपना तो कोई लेना देना नहीं उस से। बना रहा होगा कहीं जेहादी मस्जिदों में। और क्या करना हैउसे। और तू सुना तू क्या कर रहा है आज कल।
दत्त: मैं यार आज कल लीडर हूँ। माकपा छोड़ दी , आज कल ममता दीदी के साथ हु। जलसों में गुंडे भेजता हूँ। यहसाला सिंगुर विन्गुर अपना ही किया हुआ है। बहुत दहशत है इधेर अपनी। बाकि वोही तेरे वाला काम ठेके वेकेमिल जाते हैं। अच्छा पैसा बन रहा है। जब काकोरी में अंग्रेजों का नहीं छोड़ा तो यह तो अपने देश का पैसा है। औरसुखदेव से सलाम कहना यार।
सिंह: दादा ! अपना उस खत्री बच्चे से कोई लेना देना नहीं है। जानी दुश्मन हैं आज कल।
दत्त: क्यूँ क्या हुआ?
सिंह: बस यार मैंने आन्दोलन शुरू किया की पंजाबी लागू करो पंजाब में, वोह खत्री , हिन्दी का टंटा फंसा के बैठगया। दिख गया तो गोली मार दूँगा।
दत्त: चल छोड़ जाने दे। और वोह अपना राम रहीम सिंह आजाद उर्फ़ उधम सिंह कहाँ हैं आज कल।
सिंह: वोह तो इंटरनेशनल कम्बोज सभा का कन्वेनर है। ओ'डायर से समझौता हो गया था। अच्छा पैसा बना लियाहै। सुना है अगले साल इलेक्शन लडेगा। फिर खुल के खायेगा।
दत्त: और क्या नया ताज़ा है पंजाब में?
सिंह: बस यार , एक दो दिन लग जायेंगे अभी रोयल्टी इकठी करनी है। सालों ने हरेक शहर में मेरे नाम से कॉलेज, स्कूल खोले हैं और अब सुना है एक शहर भी बना दिया है। पैसे तो लूँ इनसे , आप पता नही कितने कमाते हैं।

यह सभी बातें काल्पनिक हैं और हम इसे कल्पना में भी नहीं पचा पाएंगे। क्यूंकि अपने आदर्शों को इस तरह से बातें करना तो दूर हम उन्हें यह बातें सोचते हुए भी पसंद नहीं करेंगे। लेकिन मुझे लगता है अगर यह महापुरुष आज जिंदा होते तो शायद इस तरह की बातें कभी न करते। लेकिन हम आज कल यही कर रहे हैं। पहरावा, पहचान, ज़बान, धर्म, धर्मस्थान और रिवाज़ के साथ साथ हमने शहीद भी बाँट लिए हैं. भगत सिंह, जाट सिख है, सुखदेव थापर खत्री है, लाला लाजपत राय ब्राह्मण हैं और राजगुरु मराठा हैं। हमने तो बचपन में सिर्फ़ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सुना था। लेकिन अब यह बाँट दिए गए हैं। रामप्रसाद बिस्मिल और आजाद यू पी के हैं तो पंजाबिओं का क्या काम है उन्हें याद रखने का। जो करना हैं यू पी वाले करें। क्या यह सही हो रहा है? पिछले दिनों एक अखबार में हास्यास्पद खबर पढ़ी के एक गुट ने अमृतसर बस स्टैंड का नाम मदन लाल धींगरा से बदल कर किसी सिख के नाम पर रखने के लिए धरना दिया क्यूंकि अमृतसर एक सिख बहुल इलाका है। आज बटुकेश्वर दत्त को याद नहीं किया जाता। अगर भगत सिंह ने स्कॉट को न मारा होता तो उन्हें भी दत्त की तरह उम्रकैद होती तो क्या हम उनके इस त्याग को इतनी गरिमा से याद न करते। भगत सिंह को आज कल एक गुंडे के रूप में पेश किया जा रहा है। कॉलेज के विद्यार्थी पिस्तोल पकड़े भगत सिंह की फोटो मोटर साइकिल पर लगाये घूमते हैं जिस के निचे लिखा होता है ' अँगरेज़ खंगे सी ताहीओं टंगे सी'। क्या यह सब भगत सिंह से अपेक्षित था? कुछ स्टुडेंट यूनियन भगत सिंह की फोटो लगाये पोस्टर लिए फिरते हैं और नीचे लिखा होता है "बोले कन्नां नु सुनोंन लायी धमाके दी लोढ हुन्दी है। क्या यह धमाके भगत सिंह के दर्शन का अनुसरण करते हैं। क्या भगत सिंह ने अपने जीवन काल में हमारे युवाओं से से इस बात की उम्मीद की थी, के हमारे देश का युवा ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा ।क्यूँ भगत सिंह को एक हिंसात्मक व्यक्ति के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। जब हमारे शहीदों ने कुर्बानी देते हुए प्रान्त, मज़हब और ज़बान नहीं बांटे तो हम उनको किस आधार पर इन सब पर बाँट रहे हैं। अगर हमारे शहीद जानते के उनके बाद इस मुल्क का यह हाल होने वाला है तो शायद उन्हें अपनी क़ुरबानी पर आज गर्व की जगह शर्म महसूस हो रही होगी। कुछ दिन पहले एक महानुभाव ने मोहाली स्थित राजीव गाँधी विधि यूनिवर्सिटी का नाम किसी सिख शहीद के नामपर रखने की जिद की। कई अखबारों में सुर्खियाँ थी और कारन था पंजाब में राजीव गाँधी का क्या काम। नामरखना है तो सिख शहीद पर रखो। मुझे मालूम है यह सब लिखने का कोई फायदा नही। हम न सुधरे हैं और नसुधरेंगे कभी। अगर भगत सिंह को पता होता की आजाद भारत में सत्ता के लिए खून खराबा होगा, एक दूसरे केदुश्मन बनेंगे सब तो शायद वोह अंग्रेजों के हाथ सब कुछ छोड़ कर आराम से बुढ़ापे की मौत मरता क्यूँ की उसे इसबात का सुकून तो होता की कम अज कम सब मिल के तो रहते हैं।
इस लेख में लिखे गए विचार सर्वथा निजी हैं और इनका मकसद किसी जाति या व्यक्ति विशेष को दुःख पहुँचानानही है। यह मेरी एक अपाहिज व्यथा है , जिसे मैं पहले अकेला वहन कर रहा था और अब आप सब का साथचाहता हूँ. दुष्यंत ने सही कहा था :
बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं
और
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

Sunday, November 22, 2009

क्या देशभक्ति का नाम सिर्फ़ पाकिस्तान को गाली देना है ?


कई दिनों से देख रहा हूँ की हमारी राजनीती, हमारी नफरत और हमारी असफलताएं सब पाकिस्तान और चीन केंद्रित होती जा रहीं हैं। क्या हमारे देश में देशभक्ति की परिभाषा केवल पाकिस्तान को गाली देना ही है? जाली नोट बाज़ार में आयें तो यह पाकिस्तान का किया धरा है, कहीं आतंकवादिओं ने हमला किया तो भी यह पाकिस्तानी साजिश है और अगर कोई देश पाकिस्तान को आर्थिक सहायता दे तो भी हमारी अस्मिता पर खतरा। २६/११ के हमले को आज एक साल होने को आया और हम कसाब को क़ानूनी सहायता दे रहे हैं। जिस आदमी को करोड़ों लोगों ने टीवी पर देखा क्या उसे भी बेगुनाह साबित होने तक हमने इंतज़ार करना है। अमेरिका में ९/११ के बाद कोई आतंकवादी हुम्ला नही हुआ लेकिन हमारे देश में एक बाद एक अब तक जाने कितने ही हमले हो गए हैं। क्या कारण है? शायद जानते हम सब हैं लेकिन फिर भी मानना नहीं चाहते। क्या २६/११ के आतंकवादिओं का बिना लोकल आदमी की सहायता के बम्बई में आना मुमकिन था? कैसे वोह १० आदमी कास्ट गार्ड्स को चकमा दे कर बम्बई में आ गए। क्यूँ एन एस जी के आने से पहले उन आतंकवादिओं को २४ घंटे तबाही मचाने को मिल गए। मेरा मकसद न ही उन ज़ख्मों को हरा करना हैं और न ही मैं सरकार पर कोई लांछन लगा रहा हूँ। क्या हम सब अपने आप में इतने इमानदार हैं की हम पाकिस्तान को हमारे हर नुक्सान के लिए ज़िम्मेदार ठहरा सकें। हम अभी भी भाषाई, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक और भोगोलिक मुद्दों में उलझें हैं। सरकार हो या कोई भी स्वयंसेवी संगठन हमें अपने पड़ोसी मुल्कों के प्रति हमारा राष्ट्रीय धर्म याद करवाते हैं। क्या राष्ट्रीय धरम केवल घोषित दुश्मनों के प्रति ही होता है। क्या देश में बढ़ रही अराजकता को खत्म करना राष्ट्रीयधर्म की परिभाषा में नही आता? क्या राज ठाकरे जैसे अलगाव वादियों को चुनाव में भारी बहुमत देना राष्ट्रीय धर्म है या क्षेत्रीय दलों द्वारा लोगों को ज़बान, मज़हब और प्रान्त के नाम पर बांटना राष्ट्रीय धर्म की परिभाषा में आता है? जब दफ्तरों में बाबूगिरी बढती है, जब मंत्री या उसके सहयोगी घूस खाते हैं तब उनको राष्ट्रीय धर्म कौन याद दिलाएगा? क्या राष्ट्रीय धर्म सिर्फ़ नागरिकों का दायित्व है?क्या हमारा राष्ट्रीय धर्म उन माफियों के ख़िलाफ़ बोलने का नही जो या तो बस ट्रांसपोर्ट पर क़ब्ज़ा कर के सरकारी खजाने को क्षति पहुंचाते हैं या रेत की खदानों और केबल टीवी पर क़ब्ज़ा कर के लोगो के रोज़गार का हक छीनते हैं? राष्ट्रीय धर्म तब कहाँ जाता है जब क्षेत्रीय पार्टिओं के कार्यकर्ताओं के नाम पर गुंडों की फ़ौज खड़ी की जाती है या लोगो को सभी टैक्स भरने के बाद भी सड़कों पर टोल टैक्स दे कर गुजरने पर मजबूर होना पड़ता हैं। हम हर गैरकानूनी बातों को यह सोच कर सह जाते हैं की अभियुक्त की सरकार में पहुँच है। सिर्फ़ सरकार ही नही नागरिक भी दोषी हैं। हर शाख पे उल्लू बैठा है , अंजाम ऐ गुलिस्तान क्या होगा। देश में नक्सलवाद , नशाखोरी, रिश्वत और बेईमानी हद से ज़यादा बढ़ रही है। कारण केवल एक................... बेरोज़गारी। हर हाथ को उसके लायक काम दो, सब समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएँगी। यह जो गुंडा तत्व राज ठाकरे या नक्सलियों के साथ हैं सब अपने आप सही रास्तों पर लौट आयेंगे। यह युवक जो जगह जगह दंगा फसाद करते हैं, या तोड़ फोड़ करते हैं, उन्हें न तो राज ठाकरे से लेना देना है न ही मराठी भाषा से. अगर उनके पास करने को कोई काम होता , या उनकी कोई आर्थिक मजबूरिया न होती तो क्या वो इस तरह का काम करते। ये सब राजनेताओं की चालें हैं जो पता नही कितने युगों से चली आ रही हैं। ८० के दशक में हिन्दी फ़िल्म अर्जुन में भी यही विषय था और हालत आज भी जस के तस हैं . पाकिस्तान को क्यूँ दोष देते हैं जब की आप के अपने आदमी ही बेईमान हैं। अपने को सुधारिए पड़ोसी अपने आप सुधर जायेंगे। अगर आतंकवादी आए तो किसी बम्बई वासी की सहायता के बिना यह नामुमकिन था।
अगर आदिवासी इलाकों की तररकी बाकि देश के साथ होती तो नक्सलवाद भी न आता। । अगर राजनीती आज भी सेवा होती तो मधु कौड़ा जैसे मुख्यमंत्री न होते ।
ख़ुद को ईमानदार बनाईये लोग ख़ुद डरेंगे आपसे।
ये भी मान लेते हैं के पाकिस्तान हर तरह से हिंदुस्तान के पीछे हाथ धो कर पड़ा है। वो क्यूँ न पड़े? हमारा हर पड़ोसी मुल्क जानता है के हम आज भी संगठित नही इसलिए कभी चीन अरुणाचल पर तो कभी पाकिस्तान कश्मीर पर अपना अपना राग अलापते रहते हैं। जब हम अपने देश में ही सुरक्षित नही हैं तो दूसरे मुल्कों से क्यूँ कुछ अच्छे की आशा करें।