Thursday, October 14, 2010

हो सकता है हिजरत के उन पलों में
पाँव पड़ जाये किसी सुलगती याद पर
 आवाज़ दें  तुमेह कुछ सायेदार लम्हें 
और खींच ले किसी एहसास की ठंडक 

हो सकता है  कुछ दिन निकल जायें 
ज़हन औ दिल की कशमकश में
और कलम की नोक बना दे 
एक गहरा निशान पेशानी पर

यूँ भी  हो सकता है 
खाने में कंकर का पता न लगे
और लड़ी ख़यालात की  टूटे
एक चटाख की आवाज़ के साथ

हो सकता है तीखी लगे कुछ देर 
सर्दियों की नरम धूप
और बदल ले कायनात अपनी फितरत
कुछ दिनों के लिए 

उचटती सी  नज़र डाल कर आगे बढ़ जाना
कुछ एहतमाम ज़रूरी होते हैं सफ़र के लिए 
हिजरतें कब आसान होती हैं 


Tuesday, October 5, 2010

सदियों से चल रहा है ये 


दीवाने 'मीर' हैं  'लब ऐ नाज़ुक' के 
'ज़ौक' को रोकती हैं  कभी 'दिल्ली' की गलियां 
खींच लेता है कभी 'संग ऐ आस्तां' ग़ालिब को
हाथ 'मोमिन' का भी  जुदा नहीं होता
जा बैठते हैं आज भी 'गुलज़ार'
चाय खाने में ' मंटो' के साथ,
और उलझ जाते हैं 'बद्र' जाफरानी पुलोवर में,
'निदा' को भी तो इंतज़ार  है सांवली लड़की के गुजरने का ,
'मुन्नवर' के जज़्बात जागते हैं 'माँ' के आगे  
'आदतें' 'दुष्यंत' की भी तो नहीं जातीं


हम सब फितरतन ही ऐसे हैं
यूँ बेजा शिकायत न किया करो मुझसे 


Sunday, October 3, 2010

धुआं ठहरता कहाँ  है मुट्ठी में,
बाँधने वाले अजीब होते हैं,
जब भींच लो ज़रा जोर से ,
निकलने लगता है,
उंगलीओं के वक्फों से,
कुछ  लकीरों  की  सूरत,
न कोई नक्श - ए- पा 
न कोई वजूद का सुराग,
रह जाती है  बस महक  हाथों और नथुनों में,
पुन्ग्र्ती हैं जिस से कोंपलें
हर बदलते  हुए मौसम के साथ


रख लो चंद लफ्ज़ मेरे   
मुट्ठी में अपनी ,
गाहे बगाहे सफ़र में काम आयेंगे .