Sunday, December 26, 2010

वो लम्हा

एक ख्वाब इक लम्हा  


छुप गया था कहीं मेरी बाहों में


न कोई शोर
न सरगोशी


न किसी लम्स कि हरारत


अलसाया , उनींदा सा


ले के करवट मेरी तरफ


हर लम्हा खुद से ही छुपने कि कोशिश में


आँखें नम कर गयी यह नाराज़ी उसकी 


फिर उठा तो बाहों में ले के बोला


यूँ नम न किया करो आँखें


मैं तो खुद ही तुम में हूँ
और......................




तुम कब जुदा हो खुद से..............

Thursday, December 23, 2010

'सोना'....................गुलज़ार

कभी कभी लगता है की ज़िन्दगी के मुख्तलिफ मरहलों के तजुर्बों को पहले ग़ालिब और फिर गुलज़ार साहब ने बहुत बारीकी से महसूस किया और फिर लफ़्ज़ों में पिरोया है. यह मेरा एक ज़ाती ख्याल भी हो सकता है लेकिन कभी भी कैसा भी मूड हो, उस मोजूं पर कोई ग़ज़ल या नज़्म आपको अपनी सी लगती है. ऐसी ही एक नज़्म आपकी नजर कर रहा हूँ, जिसमें गुलज़ार साहब ने फिर अपने लफ़्ज़ों के जादू को जगाया है..............

ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो................

ज़रा मद्धिम करो इस आंच को 'सोना'

कि जल जाते हैं कंगुरे नर्म रिश्तों के !

ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो ,

बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो !!

Tuesday, December 21, 2010

अधूरी आरज़ू

हर शाम एक अधूरी सी आरज़ू 
खेलती  रहती है पलकों पर 
और बीनती रहती है चंद ताज़ा मोती
छुपा लेता हूँ पलकों को उंगलीओं से
कभी आस्तीन से 
कहीं चुन्धियाँ न जायें
काएनात की आँखें 
और सोख ले
आस्तीन वो ताज़ा मोती
और.... चाहता हूँ
वो आरज़ू

यूँ ही पलकों पे हर शाम खेलती रहे 
यूँ ही ताज़ा मोतीओं से बहलती रहे 




Wednesday, December 1, 2010

ख़वाब

रोज़ समझाता हूँ उसे 
कम मचल ,
कहीं टूट कर बिखर गया तो
मुश्किल हो जायेगा, 
नंगी उंगलीओं से किरचों को चुनना 
और अंगड़ाई भी मत ले
कहीं उधड गयी पोशिश की सीवन,
तो कम पड़ जायेगा धागा तुरपाई के लिए
पर समझता कहाँ है वो,
रूठ के बैठ जाता है किसी कोने में
और कूदने फांदने लगता अपनी धुन में 
अपनी ही ज़िद में 
टूट कर बिखरता तो नहीं ,
पर अक्सर उधेड़ लेता है पोशिश की सीवन 
और कम पड़ने लगता है मुझे, 
हर  बार  धागा तुरपाई के लिए

कुछ ख़वाब बहुत जिद्दी होते हैं ...............