Thursday, September 30, 2010

'अरिहा'

गरमाने लगी है फिर से जलती हुई  छड़ियों की खुशबू,
बर्फीली सर्दियों और दीयों के दिन 
देने लगे हैं दस्तक,
चस्पां है अभी तक वो 
मासूम मुस्कराहट ज़हन में,
जब दिया था 'चाची' ने उसे  मेरे हाथों में,
परेशां सी थीं वो मेरी बाहों में,  देखती हर सु
 गूंजने लगी है अब उसकी मासूम हंसी फ़ज़ा में  ,
नापने लगे हैं छोटे से पैर घर को 
और हो जाती है मसरूफ हाथों की उंगलीओं में कभी,
जागें  हैं मेरे कई ख्वाब, उसकी आँख के साथ

वाल्कर पर पैर इठलाती 'अरिहा'
एक बरस की होगी इस साल 

5 comments:

  1. अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

    इसे पढ़े और अपने विचार दे :-
    क्यों बना रहे है नकली लोग समाज को फ्रोड ?.

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  2. बहुत ही बढिया ख्याल हैं आपके.




    श्रीराम जय राम - जय जय राम

    बधाई हो
    बधाई हो

    दोनों पक्षों को शुभकामनाएं.

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  3. i think ariha in dis pic, is also tryin to undestand wat u wanna say. anyway it rflects ur true emotions of urself toward urr daughtr,godbless ariha,god bless america

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  4. I think Ariha smile and little steps is truly reflects your feelings about your daughter. God bless Ariha.

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