Saturday, April 9, 2011

एक ठहरा हुआ वर्तमान

                                              - 1 - 

"रोज़ एक ही ख्वाब जागती  आँखों से देखता हूँ." अर्णव ने अंजलि की उंगलिया अपनी उंगलिओं में बांधते हुए कहा.

"क्या देखते हो?" अंजलि ने  भी अपनी उंगलिया अर्णव की उंगलिओं में कसीं .

"गर्मीओं की एक शाम, बादलों  में छिपा शाम का पीला सूरज, आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर, तेज़ चलती हवा में उड़ते हुए दोनों के कपड़े और यूँ ही उंगलिया बांधे देर तक चलते रहने की ज़िद........ क्या यह ख्वाब पूरा होगा?" अर्णव ने सवालिया नज़रों से अंजलि को देखा.

"ख्वाब के साथ पूरा होने की शर्त नहीं जोड़ते....बुद्धू." अंजलि ने अर्णव के काँधे पर सर टिकाते हुए कहा.

"अधूरा रह जाने  या टूट जाने की भी तो नहीं जोड़ते." अर्णव ने अंजलि की आँखों में झाँका.

अंजलि आँखें फेर कर दूसरी तरफ देखने लगी. अर्णव ने अंजलि के चेहरे को पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और अपनी सवालिया निगाहें अंजलि की आँखों में गड़ा दीं. अंजलि ने मुस्कुराते हुए हाँ कहाँ और फिर अपने को अर्णव के  सीने में छुपा दिया. 

                                              - २ -

"सो जाओ , बहुत रात हो गयी अब तो." अंजलि ने अर्णव के बालों से खेलते हुए कहा

"नहीं, अभी नींद नहीं आई."

"तो क्या करोगे?"

"तारे देखूंगा"

"रात भर?"

"जी, यह सप्त ऋषि देखा तुमने? कितने सालों से ऐसे ही, हर बार यहीं इसी मौसम में इन्हीं पड़ोसियों  की छत पर दिखाई देता है.  किसी बात का न कोई रंज न  कोई ख़ुशी , वक़्त के थपेड़ों से बेखबर वही सात  अहले महफ़िल कई सदियों से यूँ ही एक ही जगह रुके,जैसे कोई अतीत नहीं इनका, न ही कोई मुस्तकबिल सिर्फ वर्तमान और वर्तमान के सिवा कुछ नहीं." अर्नव  शून्य  में से कहीं दूर से बोला.

अंजलि हैरत से अर्णव के चेहरे को देखने लगी. उसे अर्णव की आँखों में वो ठहराव नज़र आ रहा था जिसे वो मुद्दत से देखना चाहती थी. लेकिन उस ठहराव के पसे मंज़र एक उदासी थी....... एक गहरी बे इरादा उदासी........वो उदासी जो किसी के भीड़ में खो जाने ने डर से हर वक़्त आँखों में तारी रहती है.... वो उदासी जो किसी को उदास देखने से पहले ज़हन ओ दिल पर हावी हो जाती है......

"बहुत फलसफे झाड़ने लगे हो तुम" अंजलि ने शरारती लहजे में अर्णव की आँखें बंद की और अपना सर उसकी छाती पर टिका दिया. आसमान में उमड़ते काले बादलों ने सप्तरिशी पर पर्दा डाल दिया और वर्तमान फिर नेपथ्य में वक़्त के थपेड़ों से लड़ने लगा.

                                           -  ३ -


"अब कल से मिलना और बातें कम". अंजलि ने अर्णव का हाथ पकड़ते हुए कहा.


"क्यूँ"


"अरे भई, नयी नयी नौकरी है, काम ज्यादा है तो वक़्त का तकाज़ा है" अंजलि ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.


"वक़्त का तकाज़ा थोड़ी देर ही रहे तो अच्छा." अर्णव ने एक  प्यार भरी निगाह  से अंजलि की आँखों में देखा.


"थोड़ी देर ही रहेगा" अंजलि मुस्कुराते हुए उठ के जाने की तेयारी  करने  लगी.


अर्णव ने हाथ पकड़ कर  अंजलि की उंगलिया बाँध लीं और उस लम्स की हरारत ने अंजलि के  खुद न जाने की कसक को बेपर्दा कर दिया . 

वक़्त का पहिया अपनी  ही गति से चलता वृत पूरे कर रहा था. एक निगाह और एक आवाज़ भर के फासलों में कारोबारी मस्रुफ़िआत ने एक अल्पविराम लगा दिया. एक लम्बा अल्पविराम............. पड़ोसियों की छत पे निकलता सप्त ऋषि  बादलों ले पीछे वर्तमान को रोकने  की कोशिश में लगा रहा........


                                           -4 -


सुबह घर से निकलते ही अंजलि ने अर्णव को दरवाज़े पर पाया.


"इतनी सुबह सुबह" अंजलि ने मुस्कुरा कर कहा 


"आज यूँ ही बेइरादा घूमने का इरादा है"


"अरे तुम तो खुद ही मालिक हो. हमारी तो नौकरी है सो बेइरादा नहीं घूम सकते." अंजलि ने कहा


"आज छुट्टी ले लो"


"नहीं मिलेगी"


"कोशिश तो करो"


आखिर कोशिशें ही तो कामयाब होती हैं. सप्त ऋषि फिर से बादलों के    बाहर    आने  की कोशिश करने लगा.

"मैंने ख्वाब में तुमेह अक्सर आसमानी रंग के सूट और  आसमानी रंग की चूड़ियों में देखा है" बहुत सुंदर लगती हो" अर्णव ने अंजलि से कहा


"तुम ख्वाब बहुत देखते हो" अंजलि मुस्कुरा कर बोली

" खवाबों में ही जीता हूँ  और उनके पूरा होने की शर्त भी लगा देता हूँ"

"ख्वाब के साथ पूरा होने की.................." अर्णव की उंगलिया होंठो पर महसूस होते ही बाकी के लफ्ज़  अंजलि की साँसों में ही घुट गए .

हकीकत और ख्वाब के टकराव में अक्सर ख्वाब ही चकनाचूर होते हैं लेकिन इसके बर अक्स  आज अर्णव की जिद के आगे हकीक़त हार गयी....ख्वाब रुनुमा हो उठा. आसमानी रंग ने अंजलि के रुखसार पर वो गुलाबी आभा बिखेर दी थी जिस का अर्णव एक मुद्दत से मुन्तजिर था.


"अर्णव जल्दी चलो..........हवा तेज़ है और बारिश भी आएगी" अंजलि ने उड़ते हुए आसमानी दुपट्टे को सँभालते हुए कहा

सारा आलम तारिक हो रहा था. 

"यहाँ आजाओ  इस छत के नीचे  " अंजलि ने अर्णव को खींचा


पर अर्णव चुन्धियाई  आँखों से किसी तरफ देख रहा था . अंजलि ने अर्णव  की तरफ देखा तो अर्णव के चेहरे पे एक पहचानी मुस्कान थी... दोनों के कपडे हवा में उड़ रहे थे...........आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर आसमान में बचे बादलों से चमकती बिजली में  रह रह कर चमक उठता.... और ...................

बादलों के पीछे गुरूब होता पीला सूरज  और  आसमान में उगते  सप्त ऋषि  एक ठहरे हुए वर्तमान को देख रहे थे ...............

Tuesday, March 29, 2011

ਸਲ੍ਹੀਬ


ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਪਹਿਲੇ ਜਿਹਾ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੈ 


ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਘਰੋਂ ਲੜ ਕੇ ਭੱਜ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਂਦੀ ਸੜਕ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਫੜਿਆ 
ਜਿੱਥੇ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਪਿੰਡਾਂ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਂਦੇ ਜ਼ਮੀਂਦਾਰ ਮੈਨੂੰ ਇੰਝ ਤਕਦੇ ਸਨ 
ਜਿਵੇਂ  ਕੋਈ ਪਾਗਲ ਹਸਪਤਾਲੋਂ ਭੱਜ ਵੱਗਿਆ ਹੋਵੇ


ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਮੈਨੂੰ ਉਸ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਮਜਦੂਰ ਨੇ ਪੈਸਿਆਂ ਕਰਕੇ ਹਾਕ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਾਰੀ
ਜਿਸ ਨਾਲ ਮੈਂ ਸਿਗਰਟ ਦੀ ਉਧਾਰ ਕਰ ਜਾਂਦਾ ਸੀ
ਬਹੁਤ ਦਿਨ ਹੋਏ ਮੈਂ
ਸ਼ਾਮ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਲ੍ਹਨਿਆਂ ਪਰਤਦੀਆਂ ਕੂੰਜਾਂ ਦਾ ਪੀਛਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ


ਦਿਮਾਗ ਹਰੇ ਰੰਗ ਦੀ ਕਾਈ ਨੇ ਕਬਜਾ ਲਿਆ ਹੈ
ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋ ਕੰਬਦੇ ਹੱਥਾਂ ਨਾਲ ਕਲਮ ਫੜਦਾ ਹਾਂ
ਤੇ ਹਰ ਵਾਰ ਉਸ ਵਿੱਚ ਰੋਸ਼ਨਾਈ ਖਤਮ ਹੁੰਦੀ ਹੈ


ਕਈ ਵਾਰ ਟੀਵੀ ਤੇ ਆਉਂਦੀ 'ਅਮੋਲ ਪਾਲੇਕਰ' ਦੀ ਫਿਲਮ ਵੀ
ਉਕਤਾ ਕੇ ਬੰਦ ਕਰ ਚੁੱਕਾ ਹਾਂ


ਸ਼ਾਇਦ ਕਿਸੇ ਸਲ੍ਹੀਬ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ ਮੈਨੂੰ


ਖੌਰੇ ਪੈਰਾਂ ਵਿਚ ਖੁਭੀਆਂ ਮੇਖਾਂ ਮੇਰੇ ਕਦਮਾਂ ਨੂ ਫੇਰ ਭਟਕਾ ਦੇਣ 
ਖੌਰੇ ਮੇਰੇ ਗਿੱਟਿਆਂ'ਚੋਂ ਵਗਦਾ ਲਹੂ
ਮੇਰੀ ਚੁਣੀ ਹੋਈ  ਰਾਹ ਤੇ ਨਕ਼ਸ਼ ਪਾ ਦੇਵੇ


ਖੌਰੇ ਮੇਖਾਂ ਕਾਰਣ ਹੱਥਾਂ'ਚੋਂ ਵਗਦਾ ਲਹੂ
ਮੇਰੇ ਕਲਮ ਨੂੰ ਫੇਰ ਰੋਸ਼ਨਾਈ ਬਖ਼ਸ਼ ਦੇਵੇ


ਮੇਰੇ ਸਿਰ ਤੇ ਬਨ੍ਹੀ ਕੰਡਿਆਲੀ ਤਾਰ
ਖੌਰੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਰੋਸ਼ਨਦਾਨਾਂ ਨੂੰ  ਫਿਰ ਤੋਂ  ਖੋਲ ਦੇਵੇ 
ਜਿਨ੍ਹਾਂ'ਚੋਂ ਕਦੇ ਅਦਬੀ ਹਵਾਵਾਂ ਰੁਨ੍ਕਦੀਆਂ ਸਨ


ਖੌਰੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋ ਸ਼ਹਿਰ ਵੱਲ ਨੂੰ ਪਰਤਦੇ ਜ਼ਮੀਨਦਾਰਾਂ ਨੂੰ
ਫਿਰ ਤੋਂ  ਇਕ ਪਾਗਲ ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲ ਜਾਵੇ 

Sunday, March 13, 2011

यू आर अंडर c .c . टीवी सर्विलांस"

रोज़ शाम मंदिर जाने की आदत है..धार्मिक हूँ या धरम भीरु जानने की कभी चेष्टा नहीं की. जाकर रोज़ ही लोगों को बहुत विनम्र स्वभाव में देखता हूँ.....कभी पीछे से आने वालों को रास्ता देते हैं.....पैरों की ठोकर से सिमटी चादर को सही भी करते हैं..टकरा जायें तो 'sorrry ' भी बोलते हैं... बहुत कोशिश करता हूँ रोज़ की वो बोर्ड कहीं नज़र आ जाये....जिस पर लिखा होता है" यू आर अंडर c .c . टीवी सर्विलांस" ..................

Tuesday, January 11, 2011

THROUGH DIGITAL EYE












एक लम्बे ख्वाब के सफ़र पर...........

आओ चलें उस लम्बे ख्वाब के सफ़र पर
जिसके एक छोर पर
उफक पर ठहरा हुआ सूरज
गुरूब होने से मुनकिर है
और चाहता है कि हाथों में हाथ डाले
चलते रहें  हम
ज़हन  में कुछ अधूरे ख्वाब
कुछ पुरकशिश ख्वाहिशें  लिए
उसकी जानिब
तारीक करना है उसे मंज़र
हमारे इस सफ़र के बाद
पर न जाने क्यूँ 
मन एक बेईमान की तरह
हाइल है कारोबार में कायनात  के


कुछ देर ठहर जाओ यहीं
उंगलिया  बिछड़ने से इंकार  करतीं  हैं  

Sunday, December 26, 2010

वो लम्हा

एक ख्वाब इक लम्हा  


छुप गया था कहीं मेरी बाहों में


न कोई शोर
न सरगोशी


न किसी लम्स कि हरारत


अलसाया , उनींदा सा


ले के करवट मेरी तरफ


हर लम्हा खुद से ही छुपने कि कोशिश में


आँखें नम कर गयी यह नाराज़ी उसकी 


फिर उठा तो बाहों में ले के बोला


यूँ नम न किया करो आँखें


मैं तो खुद ही तुम में हूँ
और......................




तुम कब जुदा हो खुद से..............

Thursday, December 23, 2010

'सोना'....................गुलज़ार

कभी कभी लगता है की ज़िन्दगी के मुख्तलिफ मरहलों के तजुर्बों को पहले ग़ालिब और फिर गुलज़ार साहब ने बहुत बारीकी से महसूस किया और फिर लफ़्ज़ों में पिरोया है. यह मेरा एक ज़ाती ख्याल भी हो सकता है लेकिन कभी भी कैसा भी मूड हो, उस मोजूं पर कोई ग़ज़ल या नज़्म आपको अपनी सी लगती है. ऐसी ही एक नज़्म आपकी नजर कर रहा हूँ, जिसमें गुलज़ार साहब ने फिर अपने लफ़्ज़ों के जादू को जगाया है..............

ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो................

ज़रा मद्धिम करो इस आंच को 'सोना'

कि जल जाते हैं कंगुरे नर्म रिश्तों के !

ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो ,

बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो !!

Tuesday, December 21, 2010

अधूरी आरज़ू

हर शाम एक अधूरी सी आरज़ू 
खेलती  रहती है पलकों पर 
और बीनती रहती है चंद ताज़ा मोती
छुपा लेता हूँ पलकों को उंगलीओं से
कभी आस्तीन से 
कहीं चुन्धियाँ न जायें
काएनात की आँखें 
और सोख ले
आस्तीन वो ताज़ा मोती
और.... चाहता हूँ
वो आरज़ू

यूँ ही पलकों पे हर शाम खेलती रहे 
यूँ ही ताज़ा मोतीओं से बहलती रहे