ILHAAM IS A WORD OF URDU ' WHICH MEANS GIFTED FROM ABOVE'. THIS BLOG CONTAINS THE ARTICLES DEALING WITH PROBLEMS OF COMMON MAN OF INDIA. I AM NOT A WRITER. EVERYTHING WRITTEN IN THIS BLOG IS AN 'ILHAAM' AND I THINK SOME ONE DESCENDS FROM ABOVE AND CONTROLS MY FINGERS AND PEN.
Sunday, April 8, 2012
Friday, July 1, 2011
वो शाम ..........................
लाखों लम्हों का वो मुख़्तसर सा दिन बिता कर
जब हम उस भीगे दिन की गोद से निकले थे
तब वो भी सिंधूरी रंग की चुनरी पहने
हमारे साथ ही निकली थी
बार बार आँखों से
और कभी छेड़ देती
हलकी चिकोटी से
तुम भी तो शर्माए बिना न रहते
उसकी हर शरारत पे
याद है बाँध लीं थीं
उसने एक बार उँगलियाँ तुम्हारी
और
तुम न जाने क्यूँ
किसी मुसलसल सोच में गुम
चुपचाप से
छुड़ा कर हाथ
मुड गए अगले मोड़ पर
और
वो ठिठकी सहमी सी
सुरमई रंग की चादर ओढ़े
चूमती रही तुम्हारे क़दमों को
तुमने भी कभी उसका चर्चा नहीं छेड़ा
मैं भी वो शाम उसी मोड़ पे छोड़ आया था
Friday, June 3, 2011
अपना अपना चाँद......................
कुछ दिन हवा और बादलों की आंखमिचोली में गुज़र गए......चमकीला आसमान देखे अरसा बीत गया था...
आज फिर कुछ मौसम अपना सा लगा था...आसमान की और देखा ...तारे तो चमक देख रहे थे...पर चाँद नदारद....
चाँद के इंतज़ार के कुछ लम्हे .....पूर्व से आते बादलों को देखने में लग गए ...बारिश के तो कोई आसार नहीं पर आसमान फिर से .........
मटमैला लगने लगा है .............
आज फिर कुछ मौसम अपना सा लगा था...आसमान की और देखा ...तारे तो चमक देख रहे थे...पर चाँद नदारद....
चाँद के इंतज़ार के कुछ लम्हे .....पूर्व से आते बादलों को देखने में लग गए ...बारिश के तो कोई आसार नहीं पर आसमान फिर से .........
मटमैला लगने लगा है .............
Sunday, May 22, 2011
एक ठहरा हुआ वर्तमान .............
कुछ देर पहले बरसात हुई......सारा आलम भीगा
भीगा है....छत पर बैठा हुआ तारों को देख रहा
था....'अरिहा' (मेरी छोटी सी बेटी) को भी
दिखाए......पास के प्लाट में बंजारे अपने लोकगीत गा
रहे थे.....दूर कहीं रेडिओ पर 'भूपिंदर' का गीत चल
रहा था ' दिल ढूँढता है फिर वोही.........' बीवी को
कहा प्लाट में देखे कितने अच्छे लगते हैं बंजारे गाते
हुए....' और गीत भी कितना मोजूं है इस आलम
में''............बीवी बोली 'की हो गया तुहानू...किहड़ा
प्लाट...किहड़े बंजारे.....किहड़ा रेडियो''..... न ताँ पूरे
मोहल्ले'च कोई प्लाट है न बंजारे ते रेडियो लोकां नु
सुट्टे मुद्दत हो गयी'..........
भीगा है....छत पर बैठा हुआ तारों को देख रहा
था....'अरिहा' (मेरी छोटी सी बेटी) को भी
दिखाए......पास के प्लाट में बंजारे अपने लोकगीत गा
रहे थे.....दूर कहीं रेडिओ पर 'भूपिंदर' का गीत चल
रहा था ' दिल ढूँढता है फिर वोही.........' बीवी को
कहा प्लाट में देखे कितने अच्छे लगते हैं बंजारे गाते
हुए....' और गीत भी कितना मोजूं है इस आलम
में''............बीवी बोली 'की हो गया तुहानू...किहड़ा
प्लाट...किहड़े बंजारे.....किहड़ा रेडियो''..... न ताँ पूरे
मोहल्ले'च कोई प्लाट है न बंजारे ते रेडियो लोकां नु
सुट्टे मुद्दत हो गयी'..........
शायद वर्तमान २२ साल पहले से ही कहीं रुका हुआ है .................
Saturday, April 9, 2011
एक ठहरा हुआ वर्तमान
- 1 -
"रोज़ एक ही ख्वाब जागती आँखों से देखता हूँ." अर्णव ने अंजलि की उंगलिया अपनी उंगलिओं में बांधते हुए कहा."क्या देखते हो?" अंजलि ने भी अपनी उंगलिया अर्णव की उंगलिओं में कसीं .
"गर्मीओं की एक शाम, बादलों में छिपा शाम का पीला सूरज, आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर, तेज़ चलती हवा में उड़ते हुए दोनों के कपड़े और यूँ ही उंगलिया बांधे देर तक चलते रहने की ज़िद........ क्या यह ख्वाब पूरा होगा?" अर्णव ने सवालिया नज़रों से अंजलि को देखा.
"ख्वाब के साथ पूरा होने की शर्त नहीं जोड़ते....बुद्धू." अंजलि ने अर्णव के काँधे पर सर टिकाते हुए कहा.
"अधूरा रह जाने या टूट जाने की भी तो नहीं जोड़ते." अर्णव ने अंजलि की आँखों में झाँका.
अंजलि आँखें फेर कर दूसरी तरफ देखने लगी. अर्णव ने अंजलि के चेहरे को पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और अपनी सवालिया निगाहें अंजलि की आँखों में गड़ा दीं. अंजलि ने मुस्कुराते हुए हाँ कहाँ और फिर अपने को अर्णव के सीने में छुपा दिया.
- २ -
"सो जाओ , बहुत रात हो गयी अब तो." अंजलि ने अर्णव के बालों से खेलते हुए कहा
"नहीं, अभी नींद नहीं आई."
"तो क्या करोगे?"
"तारे देखूंगा"
"रात भर?"
"जी, यह सप्त ऋषि देखा तुमने? कितने सालों से ऐसे ही, हर बार यहीं इसी मौसम में इन्हीं पड़ोसियों की छत पर दिखाई देता है. किसी बात का न कोई रंज न कोई ख़ुशी , वक़्त के थपेड़ों से बेखबर वही सात अहले महफ़िल कई सदियों से यूँ ही एक ही जगह रुके,जैसे कोई अतीत नहीं इनका, न ही कोई मुस्तकबिल सिर्फ वर्तमान और वर्तमान के सिवा कुछ नहीं." अर्नव शून्य में से कहीं दूर से बोला.
अंजलि हैरत से अर्णव के चेहरे को देखने लगी. उसे अर्णव की आँखों में वो ठहराव नज़र आ रहा था जिसे वो मुद्दत से देखना चाहती थी. लेकिन उस ठहराव के पसे मंज़र एक उदासी थी....... एक गहरी बे इरादा उदासी........वो उदासी जो किसी के भीड़ में खो जाने ने डर से हर वक़्त आँखों में तारी रहती है.... वो उदासी जो किसी को उदास देखने से पहले ज़हन ओ दिल पर हावी हो जाती है......
"बहुत फलसफे झाड़ने लगे हो तुम" अंजलि ने शरारती लहजे में अर्णव की आँखें बंद की और अपना सर उसकी छाती पर टिका दिया. आसमान में उमड़ते काले बादलों ने सप्तरिशी पर पर्दा डाल दिया और वर्तमान फिर नेपथ्य में वक़्त के थपेड़ों से लड़ने लगा.
- ३ -
"अब कल से मिलना और बातें कम". अंजलि ने अर्णव का हाथ पकड़ते हुए कहा.
"क्यूँ"
"अरे भई, नयी नयी नौकरी है, काम ज्यादा है तो वक़्त का तकाज़ा है" अंजलि ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
"थोड़ी देर ही रहेगा" अंजलि मुस्कुराते हुए उठ के जाने की तेयारी करने लगी.
अर्णव ने हाथ पकड़ कर अंजलि की उंगलिया बाँध लीं और उस लम्स की हरारत ने अंजलि के खुद न जाने की कसक को बेपर्दा कर दिया .
वक़्त का पहिया अपनी ही गति से चलता वृत पूरे कर रहा था. एक निगाह और एक आवाज़ भर के फासलों में कारोबारी मस्रुफ़िआत ने एक अल्पविराम लगा दिया. एक लम्बा अल्पविराम............. पड़ोसियों की छत पे निकलता सप्त ऋषि बादलों ले पीछे वर्तमान को रोकने की कोशिश में लगा रहा........
-4 -
सुबह घर से निकलते ही अंजलि ने अर्णव को दरवाज़े पर पाया.
"इतनी सुबह सुबह" अंजलि ने मुस्कुरा कर कहा
"आज यूँ ही बेइरादा घूमने का इरादा है"
"अरे तुम तो खुद ही मालिक हो. हमारी तो नौकरी है सो बेइरादा नहीं घूम सकते." अंजलि ने कहा
"आज छुट्टी ले लो"
"नहीं मिलेगी"
"कोशिश तो करो"
आखिर कोशिशें ही तो कामयाब होती हैं. सप्त ऋषि फिर से बादलों के बाहर आने की कोशिश करने लगा.
"मैंने ख्वाब में तुमेह अक्सर आसमानी रंग के सूट और आसमानी रंग की चूड़ियों में देखा है" बहुत सुंदर लगती हो" अर्णव ने अंजलि से कहा
"तुम ख्वाब बहुत देखते हो" अंजलि मुस्कुरा कर बोली
" खवाबों में ही जीता हूँ और उनके पूरा होने की शर्त भी लगा देता हूँ"
"ख्वाब के साथ पूरा होने की.................." अर्णव की उंगलिया होंठो पर महसूस होते ही बाकी के लफ्ज़ अंजलि की साँसों में ही घुट गए .
हकीकत और ख्वाब के टकराव में अक्सर ख्वाब ही चकनाचूर होते हैं लेकिन इसके बर अक्स आज अर्णव की जिद के आगे हकीक़त हार गयी....ख्वाब रुनुमा हो उठा. आसमानी रंग ने अंजलि के रुखसार पर वो गुलाबी आभा बिखेर दी थी जिस का अर्णव एक मुद्दत से मुन्तजिर था.
"अर्णव जल्दी चलो..........हवा तेज़ है और बारिश भी आएगी" अंजलि ने उड़ते हुए आसमानी दुपट्टे को सँभालते हुए कहा
सारा आलम तारिक हो रहा था.
पर अर्णव चुन्धियाई आँखों से किसी तरफ देख रहा था . अंजलि ने अर्णव की तरफ देखा तो अर्णव के चेहरे पे एक पहचानी मुस्कान थी... दोनों के कपडे हवा में उड़ रहे थे...........आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर आसमान में बचे बादलों से चमकती बिजली में रह रह कर चमक उठता.... और ...................
बादलों के पीछे गुरूब होता पीला सूरज और आसमान में उगते सप्त ऋषि एक ठहरे हुए वर्तमान को देख रहे थे ...............
"अब कल से मिलना और बातें कम". अंजलि ने अर्णव का हाथ पकड़ते हुए कहा.
"क्यूँ"
"अरे भई, नयी नयी नौकरी है, काम ज्यादा है तो वक़्त का तकाज़ा है" अंजलि ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
"वक़्त का तकाज़ा थोड़ी देर ही रहे तो अच्छा." अर्णव ने एक प्यार भरी निगाह से अंजलि की आँखों में देखा.
"थोड़ी देर ही रहेगा" अंजलि मुस्कुराते हुए उठ के जाने की तेयारी करने लगी.
अर्णव ने हाथ पकड़ कर अंजलि की उंगलिया बाँध लीं और उस लम्स की हरारत ने अंजलि के खुद न जाने की कसक को बेपर्दा कर दिया .
वक़्त का पहिया अपनी ही गति से चलता वृत पूरे कर रहा था. एक निगाह और एक आवाज़ भर के फासलों में कारोबारी मस्रुफ़िआत ने एक अल्पविराम लगा दिया. एक लम्बा अल्पविराम............. पड़ोसियों की छत पे निकलता सप्त ऋषि बादलों ले पीछे वर्तमान को रोकने की कोशिश में लगा रहा........
-4 -
सुबह घर से निकलते ही अंजलि ने अर्णव को दरवाज़े पर पाया.
"इतनी सुबह सुबह" अंजलि ने मुस्कुरा कर कहा
"आज यूँ ही बेइरादा घूमने का इरादा है"
"अरे तुम तो खुद ही मालिक हो. हमारी तो नौकरी है सो बेइरादा नहीं घूम सकते." अंजलि ने कहा
"आज छुट्टी ले लो"
"नहीं मिलेगी"
"कोशिश तो करो"
आखिर कोशिशें ही तो कामयाब होती हैं. सप्त ऋषि फिर से बादलों के बाहर आने की कोशिश करने लगा.
"मैंने ख्वाब में तुमेह अक्सर आसमानी रंग के सूट और आसमानी रंग की चूड़ियों में देखा है" बहुत सुंदर लगती हो" अर्णव ने अंजलि से कहा
"तुम ख्वाब बहुत देखते हो" अंजलि मुस्कुरा कर बोली
" खवाबों में ही जीता हूँ और उनके पूरा होने की शर्त भी लगा देता हूँ"
"ख्वाब के साथ पूरा होने की.................." अर्णव की उंगलिया होंठो पर महसूस होते ही बाकी के लफ्ज़ अंजलि की साँसों में ही घुट गए .
हकीकत और ख्वाब के टकराव में अक्सर ख्वाब ही चकनाचूर होते हैं लेकिन इसके बर अक्स आज अर्णव की जिद के आगे हकीक़त हार गयी....ख्वाब रुनुमा हो उठा. आसमानी रंग ने अंजलि के रुखसार पर वो गुलाबी आभा बिखेर दी थी जिस का अर्णव एक मुद्दत से मुन्तजिर था.
"अर्णव जल्दी चलो..........हवा तेज़ है और बारिश भी आएगी" अंजलि ने उड़ते हुए आसमानी दुपट्टे को सँभालते हुए कहा
सारा आलम तारिक हो रहा था.
"यहाँ आजाओ इस छत के नीचे " अंजलि ने अर्णव को खींचा
पर अर्णव चुन्धियाई आँखों से किसी तरफ देख रहा था . अंजलि ने अर्णव की तरफ देखा तो अर्णव के चेहरे पे एक पहचानी मुस्कान थी... दोनों के कपडे हवा में उड़ रहे थे...........आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर आसमान में बचे बादलों से चमकती बिजली में रह रह कर चमक उठता.... और ...................
बादलों के पीछे गुरूब होता पीला सूरज और आसमान में उगते सप्त ऋषि एक ठहरे हुए वर्तमान को देख रहे थे ...............
Tuesday, March 29, 2011
ਸਲ੍ਹੀਬ
ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਪਹਿਲੇ ਜਿਹਾ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਘਰੋਂ ਲੜ ਕੇ ਭੱਜ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਂਦੀ ਸੜਕ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਫੜਿਆ
ਜਿੱਥੇ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਪਿੰਡਾਂ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਂਦੇ ਜ਼ਮੀਂਦਾਰ ਮੈਨੂੰ ਇੰਝ ਤਕਦੇ ਸਨ ਜਿਵੇਂ ਕੋਈ ਪਾਗਲ ਹਸਪਤਾਲੋਂ ਭੱਜ ਵੱਗਿਆ ਹੋਵੇ
ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਮੈਨੂੰ ਉਸ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਮਜਦੂਰ ਨੇ ਪੈਸਿਆਂ ਕਰਕੇ ਹਾਕ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਾਰੀ
ਜਿਸ ਨਾਲ ਮੈਂ ਸਿਗਰਟ ਦੀ ਉਧਾਰ ਕਰ ਜਾਂਦਾ ਸੀ
ਬਹੁਤ ਦਿਨ ਹੋਏ ਮੈਂ
ਸ਼ਾਮ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਲ੍ਹਨਿਆਂ ਪਰਤਦੀਆਂ ਕੂੰਜਾਂ ਦਾ ਪੀਛਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ
ਦਿਮਾਗ ਹਰੇ ਰੰਗ ਦੀ ਕਾਈ ਨੇ ਕਬਜਾ ਲਿਆ ਹੈ
ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋ ਕੰਬਦੇ ਹੱਥਾਂ ਨਾਲ ਕਲਮ ਫੜਦਾ ਹਾਂ
ਤੇ ਹਰ ਵਾਰ ਉਸ ਵਿੱਚ ਰੋਸ਼ਨਾਈ ਖਤਮ ਹੁੰਦੀ ਹੈ
ਕਈ ਵਾਰ ਟੀਵੀ ਤੇ ਆਉਂਦੀ 'ਅਮੋਲ ਪਾਲੇਕਰ' ਦੀ ਫਿਲਮ ਵੀ
ਉਕਤਾ ਕੇ ਬੰਦ ਕਰ ਚੁੱਕਾ ਹਾਂ
ਸ਼ਾਇਦ ਕਿਸੇ ਸਲ੍ਹੀਬ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ ਮੈਨੂੰ
ਖੌਰੇ ਪੈਰਾਂ ਵਿਚ ਖੁਭੀਆਂ ਮੇਖਾਂ ਮੇਰੇ ਕਦਮਾਂ ਨੂ ਫੇਰ ਭਟਕਾ ਦੇਣ
ਖੌਰੇ ਮੇਰੇ ਗਿੱਟਿਆਂ'ਚੋਂ ਵਗਦਾ ਲਹੂ
ਮੇਰੀ ਚੁਣੀ ਹੋਈ ਰਾਹ ਤੇ ਨਕ਼ਸ਼ ਪਾ ਦੇਵੇ
ਖੌਰੇ ਮੇਖਾਂ ਕਾਰਣ ਹੱਥਾਂ'ਚੋਂ ਵਗਦਾ ਲਹੂ
ਮੇਰੇ ਕਲਮ ਨੂੰ ਫੇਰ ਰੋਸ਼ਨਾਈ ਬਖ਼ਸ਼ ਦੇਵੇ
ਮੇਰੇ ਸਿਰ ਤੇ ਬਨ੍ਹੀ ਕੰਡਿਆਲੀ ਤਾਰ
ਖੌਰੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਰੋਸ਼ਨਦਾਨਾਂ ਨੂੰ ਫਿਰ ਤੋਂ ਖੋਲ ਦੇਵੇ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ'ਚੋਂ ਕਦੇ ਅਦਬੀ ਹਵਾਵਾਂ ਰੁਨ੍ਕਦੀਆਂ ਸਨ
ਖੌਰੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋ ਸ਼ਹਿਰ ਵੱਲ ਨੂੰ ਪਰਤਦੇ ਜ਼ਮੀਨਦਾਰਾਂ ਨੂੰ
ਫਿਰ ਤੋਂ ਇਕ ਪਾਗਲ ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲ ਜਾਵੇ
Sunday, March 13, 2011
यू आर अंडर c .c . टीवी सर्विलांस"
रोज़ शाम मंदिर जाने की आदत है..धार्मिक हूँ या धरम भीरु जानने की कभी चेष्टा नहीं की. जाकर रोज़ ही लोगों को बहुत विनम्र स्वभाव में देखता हूँ.....कभी पीछे से आने वालों को रास्ता देते हैं.....पैरों की ठोकर से सिमटी चादर को सही भी करते हैं..टकरा जायें तो 'sorrry ' भी बोलते हैं... बहुत कोशिश करता हूँ रोज़ की वो बोर्ड कहीं नज़र आ जाये....जिस पर लिखा होता है" यू आर अंडर c .c . टीवी सर्विलांस" ..................
Tuesday, January 11, 2011
Subscribe to:
Posts (Atom)
