Tuesday, January 11, 2011

एक लम्बे ख्वाब के सफ़र पर...........

आओ चलें उस लम्बे ख्वाब के सफ़र पर
जिसके एक छोर पर
उफक पर ठहरा हुआ सूरज
गुरूब होने से मुनकिर है
और चाहता है कि हाथों में हाथ डाले
चलते रहें  हम
ज़हन  में कुछ अधूरे ख्वाब
कुछ पुरकशिश ख्वाहिशें  लिए
उसकी जानिब
तारीक करना है उसे मंज़र
हमारे इस सफ़र के बाद
पर न जाने क्यूँ 
मन एक बेईमान की तरह
हाइल है कारोबार में कायनात  के


कुछ देर ठहर जाओ यहीं
उंगलिया  बिछड़ने से इंकार  करतीं  हैं  

Sunday, December 26, 2010

वो लम्हा

एक ख्वाब इक लम्हा  


छुप गया था कहीं मेरी बाहों में


न कोई शोर
न सरगोशी


न किसी लम्स कि हरारत


अलसाया , उनींदा सा


ले के करवट मेरी तरफ


हर लम्हा खुद से ही छुपने कि कोशिश में


आँखें नम कर गयी यह नाराज़ी उसकी 


फिर उठा तो बाहों में ले के बोला


यूँ नम न किया करो आँखें


मैं तो खुद ही तुम में हूँ
और......................




तुम कब जुदा हो खुद से..............

Thursday, December 23, 2010

'सोना'....................गुलज़ार

कभी कभी लगता है की ज़िन्दगी के मुख्तलिफ मरहलों के तजुर्बों को पहले ग़ालिब और फिर गुलज़ार साहब ने बहुत बारीकी से महसूस किया और फिर लफ़्ज़ों में पिरोया है. यह मेरा एक ज़ाती ख्याल भी हो सकता है लेकिन कभी भी कैसा भी मूड हो, उस मोजूं पर कोई ग़ज़ल या नज़्म आपको अपनी सी लगती है. ऐसी ही एक नज़्म आपकी नजर कर रहा हूँ, जिसमें गुलज़ार साहब ने फिर अपने लफ़्ज़ों के जादू को जगाया है..............

ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो................

ज़रा मद्धिम करो इस आंच को 'सोना'

कि जल जाते हैं कंगुरे नर्म रिश्तों के !

ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो ,

बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो !!

Tuesday, December 21, 2010

अधूरी आरज़ू

हर शाम एक अधूरी सी आरज़ू 
खेलती  रहती है पलकों पर 
और बीनती रहती है चंद ताज़ा मोती
छुपा लेता हूँ पलकों को उंगलीओं से
कभी आस्तीन से 
कहीं चुन्धियाँ न जायें
काएनात की आँखें 
और सोख ले
आस्तीन वो ताज़ा मोती
और.... चाहता हूँ
वो आरज़ू

यूँ ही पलकों पे हर शाम खेलती रहे 
यूँ ही ताज़ा मोतीओं से बहलती रहे 




Wednesday, December 1, 2010

ख़वाब

रोज़ समझाता हूँ उसे 
कम मचल ,
कहीं टूट कर बिखर गया तो
मुश्किल हो जायेगा, 
नंगी उंगलीओं से किरचों को चुनना 
और अंगड़ाई भी मत ले
कहीं उधड गयी पोशिश की सीवन,
तो कम पड़ जायेगा धागा तुरपाई के लिए
पर समझता कहाँ है वो,
रूठ के बैठ जाता है किसी कोने में
और कूदने फांदने लगता अपनी धुन में 
अपनी ही ज़िद में 
टूट कर बिखरता तो नहीं ,
पर अक्सर उधेड़ लेता है पोशिश की सीवन 
और कम पड़ने लगता है मुझे, 
हर  बार  धागा तुरपाई के लिए

कुछ ख़वाब बहुत जिद्दी होते हैं ............... 

Sunday, November 28, 2010

कुर्बतों के फासिले

                 आज कल खुद्कलामी का वक़्त ढूंढे भी नहीं मिलता. कभी खुद्कलामी में यादों की ज़्म्बील खोलें तो बहुत सी पुरकशिश अधूरी ख्वाहिशें हालात की गर्द में पाएमाल मिलती हैं. क्यूंकि पूरी हुई ख्वाहिशों और ख्वाबों की कशिश तो शुक्राने की रस्म के बाद ही खत्म हो जाती है. कशिश ही नासहल रास्तों को इख्तियार करने की हिम्मत देती है. अर्णव आज फिर पगडण्डी के सहल रास्ते को छोड़ कर एक नासहल रास्ते से पहाड़ी के ऊपर चढ़ता जा रहा था. ये रास्ता कभी सहल न था लेकिन  डूबते सूरज को देखने की कशिश हर बार इस नासहल रास्ते पर भारी  पड़ती.  वो एक इबाद्तगुजार की तरह अपनी इबादतगाह की तरफ बावक्त आगे बढ़ता जा रहा था. अंजलि आज भी वहां नहीं थी. अंजलि रोज़ ही वहां नहीं होती थी लेकिन यह तस्सवुर उसकी आदत में शुमार था. पहाड़ी पर बैठ कर डूबते सूरज को देखते हुए अपने ख्यालों कि चेहरा नवीसी उसके मामूल का  एक हिस्सा थी.पहाड़ी से दूर वादी में एक पीला बल्ब टिमटिमाता हुआ सूरज को शिकस्त देने को कोशिश करता .जब सूरज डूब कर सारा मंज़र तारीक कर देता तो  वो पीला बल्ब उसे अंजलि से मिलने का एक वसीला सा लगता. जब पहाडिया अपनी गाय अन्दर करता तो उसके भी लौटने का वक़्त हो जाता, जहाँ लोगों कि तंज़ आमेज़ नज़रें उसका इंतज़ार कर रहीं होतीं.  खुद्सुपुर्दगी उसे कभी अच्छी नहीं लगी . अक्सर एक सवाल उसके ज़हन में उभरता कि वो आज़ाद होते हुए भी कई चीज़ों से कितना बंधा हुआ है.....  
             
                अंजलि अर्णव का वो ख़्वाब थी  जो उसकी ज़हनी शख्सियत को  पुख्तगी बख्श रही थी.वो अंजलि से जब भी मिलता तो दोनों एक दूसरे को अपने रिश्ते की  रूहानियत समझाने  लगते. किस तरह एक न नज़र आने वाला एहसास दोनों को बांधे है. दोनों एक ही बात पे हँसते हैं, एक ही बात पे रोते हैं, एक ही वक़्त में एक बात सोचते हैं और इतने फासले पर होने पर भी सुन लेते हैं एक दूसरे को. सब्र आज़मां हालात और कम वसीले उन्हें जिस्मानी तौर पर जितना दूर किये जा रहे थे, ज़हनी तौर पर वो उतने ही करीब आ रहे थे. कभी कभी अंजलि अर्णव को दूर वादी में जलते उस पीले बल्ब कि तरह लगती जो हर शाम सूरज को शिकस्त देने की कोशिश में होता और दुनिया को उस वक़्त रौशनी बख्शता जब कायनात में हर तरफ तारीकी ही तारी होती.

                  "आज तुम मुझे बहुत दिन बाद मिल रही हो" अर्णव ने अंजलि से शिकायती लहजे में कहा. अंजलि ने अर्णव का हाथ अपने हाथ  में लेकर उसे अपने एहसास कि गर्मी से वाबस्ता कराया. आँखों से ढलकते अश्क  मोतियों कि शक्ल में  दोनों के आरिज़ ओ चश्म को ताबानी बख्श रहे थे. पानी यूँ तो बुनियाद के लिए अच्छा नहीं होता, इस के बरअक्स आँखों से ढलते अश्क उनकी ज़हनी कुर्बत कीबुनियाद को पुख्ता कर रहे थे. अर्णव अक्सर तन्हाई में जब भी अंजलि को अपने जज़्बात और ख़याल आराई बयाँ करता तो अर्णव का मासूम अंदाज़ अंजलि कि नज़रों में उसकी इज्ज़त अफज़ाई करता .आज अर्णव से डूबते हुए सूरज और टिमटिमाते पीले बल्ब  का मंज़र सुनते हुए  अंजलि को यह कुर्बतों के फासिले नाकाबिले बर्दाश्त हो रहे थे.  हकीक़त में अर्णव से दूर होना उसे गुनाह लगने लगा. अंजलि ने अर्णव को खींच कर अपने आगोश में लिया . अर्णव को अंजलि कीआँखों में वादी का वो पीला बल्ब पुररोशन दिखाई देने लगा.


                 वक़्त कि पाबन्दी आज फिर उस इबादात् गुज़ार को उसकी इबादत गाह की तरफ उसी नासहल रास्ते से ले कर जा रही थी. आज न  जाने क्यूँ  अर्णव को यूँ लग रहा था जैसे उसकी एह्सासी मिलकियत से कोई उससे पहले गुज़र गया है. दबी हुई मिटटी के नक्श  और पायमाल नख्ल उसके ख्याल की गवाही दे रहे थे. तमाम मुश्किलात के बाद जब अर्णव अपनी ख़ाम ख़याली में पहाड़ी पर पहुंचा तो अंजलि सामने डूबते हुए सूरज को देख रही थी. डूबते हुए सूरज कि  सिन्दूरी रंगत  में उसे अंजलि का मासूम चेहरा  पुरजमाल नज़र आ रहा था . अर्णव  अपनी ख़ाम ख़याली में अंजलि के पहलु में बैठ गया. जब  वादी का पीला बल्ब सूरज को शिकस्त देने की एक कामयाब कोशिश में था  तब अंजलि ने अर्णव का हाथ पकड़ कर उसके ख्यालों के सिलसिले को तोडा और उसे लेकर उस पीले बल्ब की ज़ानिब चलने लगी और अर्णव एक मासूम बच्चे की तरह अंजलि की कदम बोसी करने लगा............  
          
              

Saturday, November 27, 2010

फासले

कौन कहता है लफ़्ज़ों के पाँव नहीं होते
कौन कहता है  लफ्ज़ अपाहिज होते हैं
लफ्ज़ तो चारागर हैं
लफ्ज़ ही तो ले जाते हैं मुझे
उस सुनसान पहाड़ी पर जहाँ 
 ढलते हुए सूरज की सिंदूरी रंगत
बढाने लगती है दिल की तारीकी 
और दूर एक पीला बल्ब जलता हुआ
एक वसीला सा मालूम पड़ता है
 लफ़्ज़ों के दर्द को महसूस कर
आ जाती हो तुम भी 
बैठ जाती हो मेरे पहलु में
 हाएल हो जाती है
एक जद्दोजहद
मेरी ख़ाम खयाली और तुम्हारी जिद में
जब ले चलती हो तुम मुझे

 उस पीले बल्ब की जानिब

Sunday, November 21, 2010

इन्कलाब

आज एक दोस्त से मैखाने  में मुलाक़ात हुई ........शराब और शायरी का चोली दामन का साथ है इसलिए शे'र कहना लाजिम था चाहे तल्फुज़ ठीक  हो  या  न हो .......जनाब ने फ़रमाया
चंद तस्वीरें बुतां चंद हसीनो के खतूत 
बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला

शायर गुनाहगार भी लगा और पलायनवादी भी..........लम्बी फेहरिस्त है गुनाहगारों की.....क्यूंकि मेरा भी नाम शामिल है इस में....... आवाम मैखानों में शराब के आंसू पी रही है...........शायर न हालात पे रंजीदा है न ही संजीदा ...........एक सवाल ज़हन को कचोट रहा है कि मरने पर..........
शायर के घर से इन्कलाब क्यूँ नहीं निकलता
बगावत लेखक के घर पैदा क्यूँ नहीं होती...............?????