Sunday, April 8, 2012

जज़्बात हैं भिखारन कि रिदा ओढ़े हुए

वफ़ा न-आशना लोगों कि निगरानी में है

जब तडपते रहना ही है मुकद्दर तेरा

तू क्या सोच कर इतनी पशेमानी में है

कब तक सुलगते सन्नाटों का अलाव तापोगे

कब तक इस रात को बालिश्तों से नापोगे 

ये रात ढलती है, ढली है न ढलेगी कभी

ऐसे मंज़र में अपने ही साये से कांपोगे

वो तस्सवुर ही भला  क्या जो उसे याद नहीं

वो सरगिराँ है मगर क्यूँ  नाशाद नहीं

वो ग़मज़दा होने का उलाहना देता है तुझे

और तू मुस्कुराये ये तेरी अभी औकात नहीं 
 


जज़्बात हैं भिखारन कि रिदा ओढ़े हुए
वफ़ा न-आशना लोगों कि निगरानी में है
जब तडपते रहना ही है मुकद्दर तेरा
तू क्या सोच कर इतनी पशेमानी में है

कब तक सुलगते सन्नाटों का अलाव तापोगे
कब तक इस रात को बालिश्तों से नापोगे 
ये रात ढलती है, ढली है न ढलेगी कभी
ऐसे मंज़र में अपने ही साये से कांपोगे

वो तस्सवुर ही क्या जो उसे याद नहीं
वो सरगिराँ है मगर नाशाद नहीं
वो ग़मज़दा होने का उलाहना देता है तुझे
और तू मुस्कुराये ये तेरी अभी औकात नहीं 

'हामिला'

सुबह दम ही हार के बैठ जाता है

ज़र्द कमज़ोर होंठो में

बुदबुदाता रहता है

न जानेक्या क्या कुछ

पकड़ा दूं तो गिरा देता है

कांपते हाथों से 

दिन भर के चुगे हुए

लम्हे 

ज़रा भींच लूं 

और लगा लूं गले से

तस्सल्ली के लिए

तोऔर बढा जाता है दर्द मेरा 

वक़्त भी शायद 'हामिला' है इन  दिनों 

हामिला: प्रेग्नेंट , गर्भवती 

Friday, July 1, 2011

वो शाम ..........................


लाखों लम्हों का वो मुख़्तसर सा दिन बिता  कर

जब हम उस भीगे  दिन की गोद से निकले थे

तब वो भी सिंधूरी  रंग की चुनरी  पहने 

हमारे साथ ही निकली थी

बार बार आँखों से 

और कभी छेड़ देती 

हलकी  चिकोटी से

तुम भी तो शर्माए बिना न रहते  

उसकी हर शरारत पे 

याद है बाँध लीं थीं

उसने एक बार उँगलियाँ तुम्हारी

और

तुम न जाने क्यूँ 

किसी मुसलसल सोच में गुम

चुपचाप   से

छुड़ा कर हाथ

मुड गए अगले मोड़ पर

और 

वो ठिठकी सहमी सी 

सुरमई रंग की चादर ओढ़े 

चूमती  रही  तुम्हारे क़दमों को


तुमने भी कभी उसका चर्चा नहीं छेड़ा

मैं भी वो शाम उसी मोड़ पे छोड़ आया था 

Friday, June 3, 2011

अपना अपना चाँद......................

कुछ दिन हवा और बादलों की आंखमिचोली में गुज़र गए......चमकीला आसमान देखे अरसा बीत गया था...
आज फिर कुछ मौसम अपना सा लगा था...आसमान की और देखा ...तारे तो चमक देख रहे थे...पर चाँद नदारद....


चाँद के इंतज़ार के कुछ लम्हे .....पूर्व से आते बादलों को देखने में लग गए ...बारिश के तो कोई आसार नहीं पर आसमान फिर से .........


मटमैला लगने लगा है   .............

Sunday, May 22, 2011

एक ठहरा हुआ वर्तमान .............


कुछ देर पहले बरसात हुई......सारा आलम भीगा


 भीगा है....छत पर बैठा हुआ तारों को देख रहा 


था....'अरिहा' (मेरी छोटी सी बेटी) को भी 


दिखाए......पास के प्लाट में बंजारे अपने लोकगीत गा 


रहे थे.....दूर कहीं रेडिओ पर 'भूपिंदर' का गीत चल 


रहा था ' दिल ढूँढता है फिर वोही.........' बीवी को 


कहा प्लाट में देखे कितने अच्छे लगते हैं बंजारे गाते 


हुए....' और गीत भी कितना मोजूं है इस आलम 


में''............बीवी बोली 'की हो गया तुहानू...किहड़ा 


प्लाट...किहड़े बंजारे.....किहड़ा रेडियो''..... न ताँ पूरे 


मोहल्ले'च कोई प्लाट है न बंजारे ते रेडियो लोकां नु 


सुट्टे मुद्दत हो गयी'..........


शायद वर्तमान २२ साल पहले से ही कहीं रुका हुआ है .................

Saturday, April 9, 2011

एक ठहरा हुआ वर्तमान

                                              - 1 - 

"रोज़ एक ही ख्वाब जागती  आँखों से देखता हूँ." अर्णव ने अंजलि की उंगलिया अपनी उंगलिओं में बांधते हुए कहा.

"क्या देखते हो?" अंजलि ने  भी अपनी उंगलिया अर्णव की उंगलिओं में कसीं .

"गर्मीओं की एक शाम, बादलों  में छिपा शाम का पीला सूरज, आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर, तेज़ चलती हवा में उड़ते हुए दोनों के कपड़े और यूँ ही उंगलिया बांधे देर तक चलते रहने की ज़िद........ क्या यह ख्वाब पूरा होगा?" अर्णव ने सवालिया नज़रों से अंजलि को देखा.

"ख्वाब के साथ पूरा होने की शर्त नहीं जोड़ते....बुद्धू." अंजलि ने अर्णव के काँधे पर सर टिकाते हुए कहा.

"अधूरा रह जाने  या टूट जाने की भी तो नहीं जोड़ते." अर्णव ने अंजलि की आँखों में झाँका.

अंजलि आँखें फेर कर दूसरी तरफ देखने लगी. अर्णव ने अंजलि के चेहरे को पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और अपनी सवालिया निगाहें अंजलि की आँखों में गड़ा दीं. अंजलि ने मुस्कुराते हुए हाँ कहाँ और फिर अपने को अर्णव के  सीने में छुपा दिया. 

                                              - २ -

"सो जाओ , बहुत रात हो गयी अब तो." अंजलि ने अर्णव के बालों से खेलते हुए कहा

"नहीं, अभी नींद नहीं आई."

"तो क्या करोगे?"

"तारे देखूंगा"

"रात भर?"

"जी, यह सप्त ऋषि देखा तुमने? कितने सालों से ऐसे ही, हर बार यहीं इसी मौसम में इन्हीं पड़ोसियों  की छत पर दिखाई देता है.  किसी बात का न कोई रंज न  कोई ख़ुशी , वक़्त के थपेड़ों से बेखबर वही सात  अहले महफ़िल कई सदियों से यूँ ही एक ही जगह रुके,जैसे कोई अतीत नहीं इनका, न ही कोई मुस्तकबिल सिर्फ वर्तमान और वर्तमान के सिवा कुछ नहीं." अर्नव  शून्य  में से कहीं दूर से बोला.

अंजलि हैरत से अर्णव के चेहरे को देखने लगी. उसे अर्णव की आँखों में वो ठहराव नज़र आ रहा था जिसे वो मुद्दत से देखना चाहती थी. लेकिन उस ठहराव के पसे मंज़र एक उदासी थी....... एक गहरी बे इरादा उदासी........वो उदासी जो किसी के भीड़ में खो जाने ने डर से हर वक़्त आँखों में तारी रहती है.... वो उदासी जो किसी को उदास देखने से पहले ज़हन ओ दिल पर हावी हो जाती है......

"बहुत फलसफे झाड़ने लगे हो तुम" अंजलि ने शरारती लहजे में अर्णव की आँखें बंद की और अपना सर उसकी छाती पर टिका दिया. आसमान में उमड़ते काले बादलों ने सप्तरिशी पर पर्दा डाल दिया और वर्तमान फिर नेपथ्य में वक़्त के थपेड़ों से लड़ने लगा.

                                           -  ३ -


"अब कल से मिलना और बातें कम". अंजलि ने अर्णव का हाथ पकड़ते हुए कहा.


"क्यूँ"


"अरे भई, नयी नयी नौकरी है, काम ज्यादा है तो वक़्त का तकाज़ा है" अंजलि ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.


"वक़्त का तकाज़ा थोड़ी देर ही रहे तो अच्छा." अर्णव ने एक  प्यार भरी निगाह  से अंजलि की आँखों में देखा.


"थोड़ी देर ही रहेगा" अंजलि मुस्कुराते हुए उठ के जाने की तेयारी  करने  लगी.


अर्णव ने हाथ पकड़ कर  अंजलि की उंगलिया बाँध लीं और उस लम्स की हरारत ने अंजलि के  खुद न जाने की कसक को बेपर्दा कर दिया . 

वक़्त का पहिया अपनी  ही गति से चलता वृत पूरे कर रहा था. एक निगाह और एक आवाज़ भर के फासलों में कारोबारी मस्रुफ़िआत ने एक अल्पविराम लगा दिया. एक लम्बा अल्पविराम............. पड़ोसियों की छत पे निकलता सप्त ऋषि  बादलों ले पीछे वर्तमान को रोकने  की कोशिश में लगा रहा........


                                           -4 -


सुबह घर से निकलते ही अंजलि ने अर्णव को दरवाज़े पर पाया.


"इतनी सुबह सुबह" अंजलि ने मुस्कुरा कर कहा 


"आज यूँ ही बेइरादा घूमने का इरादा है"


"अरे तुम तो खुद ही मालिक हो. हमारी तो नौकरी है सो बेइरादा नहीं घूम सकते." अंजलि ने कहा


"आज छुट्टी ले लो"


"नहीं मिलेगी"


"कोशिश तो करो"


आखिर कोशिशें ही तो कामयाब होती हैं. सप्त ऋषि फिर से बादलों के    बाहर    आने  की कोशिश करने लगा.

"मैंने ख्वाब में तुमेह अक्सर आसमानी रंग के सूट और  आसमानी रंग की चूड़ियों में देखा है" बहुत सुंदर लगती हो" अर्णव ने अंजलि से कहा


"तुम ख्वाब बहुत देखते हो" अंजलि मुस्कुरा कर बोली

" खवाबों में ही जीता हूँ  और उनके पूरा होने की शर्त भी लगा देता हूँ"

"ख्वाब के साथ पूरा होने की.................." अर्णव की उंगलिया होंठो पर महसूस होते ही बाकी के लफ्ज़  अंजलि की साँसों में ही घुट गए .

हकीकत और ख्वाब के टकराव में अक्सर ख्वाब ही चकनाचूर होते हैं लेकिन इसके बर अक्स  आज अर्णव की जिद के आगे हकीक़त हार गयी....ख्वाब रुनुमा हो उठा. आसमानी रंग ने अंजलि के रुखसार पर वो गुलाबी आभा बिखेर दी थी जिस का अर्णव एक मुद्दत से मुन्तजिर था.


"अर्णव जल्दी चलो..........हवा तेज़ है और बारिश भी आएगी" अंजलि ने उड़ते हुए आसमानी दुपट्टे को सँभालते हुए कहा

सारा आलम तारिक हो रहा था. 

"यहाँ आजाओ  इस छत के नीचे  " अंजलि ने अर्णव को खींचा


पर अर्णव चुन्धियाई  आँखों से किसी तरफ देख रहा था . अंजलि ने अर्णव  की तरफ देखा तो अर्णव के चेहरे पे एक पहचानी मुस्कान थी... दोनों के कपडे हवा में उड़ रहे थे...........आँखों भर की दूरी पर एक खंडहर आसमान में बचे बादलों से चमकती बिजली में  रह रह कर चमक उठता.... और ...................

बादलों के पीछे गुरूब होता पीला सूरज  और  आसमान में उगते  सप्त ऋषि  एक ठहरे हुए वर्तमान को देख रहे थे ...............

Tuesday, March 29, 2011

ਸਲ੍ਹੀਬ


ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਪਹਿਲੇ ਜਿਹਾ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੈ 


ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਘਰੋਂ ਲੜ ਕੇ ਭੱਜ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਂਦੀ ਸੜਕ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਫੜਿਆ 
ਜਿੱਥੇ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਪਿੰਡਾਂ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਂਦੇ ਜ਼ਮੀਂਦਾਰ ਮੈਨੂੰ ਇੰਝ ਤਕਦੇ ਸਨ 
ਜਿਵੇਂ  ਕੋਈ ਪਾਗਲ ਹਸਪਤਾਲੋਂ ਭੱਜ ਵੱਗਿਆ ਹੋਵੇ


ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਮੈਨੂੰ ਉਸ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਮਜਦੂਰ ਨੇ ਪੈਸਿਆਂ ਕਰਕੇ ਹਾਕ ਵੀ ਨਹੀਂ ਮਾਰੀ
ਜਿਸ ਨਾਲ ਮੈਂ ਸਿਗਰਟ ਦੀ ਉਧਾਰ ਕਰ ਜਾਂਦਾ ਸੀ
ਬਹੁਤ ਦਿਨ ਹੋਏ ਮੈਂ
ਸ਼ਾਮ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਲ੍ਹਨਿਆਂ ਪਰਤਦੀਆਂ ਕੂੰਜਾਂ ਦਾ ਪੀਛਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ


ਦਿਮਾਗ ਹਰੇ ਰੰਗ ਦੀ ਕਾਈ ਨੇ ਕਬਜਾ ਲਿਆ ਹੈ
ਬਹੁਤ ਦਿਨਾਂ ਤੋ ਕੰਬਦੇ ਹੱਥਾਂ ਨਾਲ ਕਲਮ ਫੜਦਾ ਹਾਂ
ਤੇ ਹਰ ਵਾਰ ਉਸ ਵਿੱਚ ਰੋਸ਼ਨਾਈ ਖਤਮ ਹੁੰਦੀ ਹੈ


ਕਈ ਵਾਰ ਟੀਵੀ ਤੇ ਆਉਂਦੀ 'ਅਮੋਲ ਪਾਲੇਕਰ' ਦੀ ਫਿਲਮ ਵੀ
ਉਕਤਾ ਕੇ ਬੰਦ ਕਰ ਚੁੱਕਾ ਹਾਂ


ਸ਼ਾਇਦ ਕਿਸੇ ਸਲ੍ਹੀਬ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ ਮੈਨੂੰ


ਖੌਰੇ ਪੈਰਾਂ ਵਿਚ ਖੁਭੀਆਂ ਮੇਖਾਂ ਮੇਰੇ ਕਦਮਾਂ ਨੂ ਫੇਰ ਭਟਕਾ ਦੇਣ 
ਖੌਰੇ ਮੇਰੇ ਗਿੱਟਿਆਂ'ਚੋਂ ਵਗਦਾ ਲਹੂ
ਮੇਰੀ ਚੁਣੀ ਹੋਈ  ਰਾਹ ਤੇ ਨਕ਼ਸ਼ ਪਾ ਦੇਵੇ


ਖੌਰੇ ਮੇਖਾਂ ਕਾਰਣ ਹੱਥਾਂ'ਚੋਂ ਵਗਦਾ ਲਹੂ
ਮੇਰੇ ਕਲਮ ਨੂੰ ਫੇਰ ਰੋਸ਼ਨਾਈ ਬਖ਼ਸ਼ ਦੇਵੇ


ਮੇਰੇ ਸਿਰ ਤੇ ਬਨ੍ਹੀ ਕੰਡਿਆਲੀ ਤਾਰ
ਖੌਰੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਰੋਸ਼ਨਦਾਨਾਂ ਨੂੰ  ਫਿਰ ਤੋਂ  ਖੋਲ ਦੇਵੇ 
ਜਿਨ੍ਹਾਂ'ਚੋਂ ਕਦੇ ਅਦਬੀ ਹਵਾਵਾਂ ਰੁਨ੍ਕਦੀਆਂ ਸਨ


ਖੌਰੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋ ਸ਼ਹਿਰ ਵੱਲ ਨੂੰ ਪਰਤਦੇ ਜ਼ਮੀਨਦਾਰਾਂ ਨੂੰ
ਫਿਰ ਤੋਂ  ਇਕ ਪਾਗਲ ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਮਿਲ ਜਾਵੇ 

Sunday, March 13, 2011

यू आर अंडर c .c . टीवी सर्विलांस"

रोज़ शाम मंदिर जाने की आदत है..धार्मिक हूँ या धरम भीरु जानने की कभी चेष्टा नहीं की. जाकर रोज़ ही लोगों को बहुत विनम्र स्वभाव में देखता हूँ.....कभी पीछे से आने वालों को रास्ता देते हैं.....पैरों की ठोकर से सिमटी चादर को सही भी करते हैं..टकरा जायें तो 'sorrry ' भी बोलते हैं... बहुत कोशिश करता हूँ रोज़ की वो बोर्ड कहीं नज़र आ जाये....जिस पर लिखा होता है" यू आर अंडर c .c . टीवी सर्विलांस" ..................

Tuesday, January 11, 2011

THROUGH DIGITAL EYE












एक लम्बे ख्वाब के सफ़र पर...........

आओ चलें उस लम्बे ख्वाब के सफ़र पर
जिसके एक छोर पर
उफक पर ठहरा हुआ सूरज
गुरूब होने से मुनकिर है
और चाहता है कि हाथों में हाथ डाले
चलते रहें  हम
ज़हन  में कुछ अधूरे ख्वाब
कुछ पुरकशिश ख्वाहिशें  लिए
उसकी जानिब
तारीक करना है उसे मंज़र
हमारे इस सफ़र के बाद
पर न जाने क्यूँ 
मन एक बेईमान की तरह
हाइल है कारोबार में कायनात  के


कुछ देर ठहर जाओ यहीं
उंगलिया  बिछड़ने से इंकार  करतीं  हैं  

Sunday, December 26, 2010

वो लम्हा

एक ख्वाब इक लम्हा  


छुप गया था कहीं मेरी बाहों में


न कोई शोर
न सरगोशी


न किसी लम्स कि हरारत


अलसाया , उनींदा सा


ले के करवट मेरी तरफ


हर लम्हा खुद से ही छुपने कि कोशिश में


आँखें नम कर गयी यह नाराज़ी उसकी 


फिर उठा तो बाहों में ले के बोला


यूँ नम न किया करो आँखें


मैं तो खुद ही तुम में हूँ
और......................




तुम कब जुदा हो खुद से..............

Thursday, December 23, 2010

'सोना'....................गुलज़ार

कभी कभी लगता है की ज़िन्दगी के मुख्तलिफ मरहलों के तजुर्बों को पहले ग़ालिब और फिर गुलज़ार साहब ने बहुत बारीकी से महसूस किया और फिर लफ़्ज़ों में पिरोया है. यह मेरा एक ज़ाती ख्याल भी हो सकता है लेकिन कभी भी कैसा भी मूड हो, उस मोजूं पर कोई ग़ज़ल या नज़्म आपको अपनी सी लगती है. ऐसी ही एक नज़्म आपकी नजर कर रहा हूँ, जिसमें गुलज़ार साहब ने फिर अपने लफ़्ज़ों के जादू को जगाया है..............

ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो................

ज़रा मद्धिम करो इस आंच को 'सोना'

कि जल जाते हैं कंगुरे नर्म रिश्तों के !

ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो ,

बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो !!

Tuesday, December 21, 2010

अधूरी आरज़ू

हर शाम एक अधूरी सी आरज़ू 
खेलती  रहती है पलकों पर 
और बीनती रहती है चंद ताज़ा मोती
छुपा लेता हूँ पलकों को उंगलीओं से
कभी आस्तीन से 
कहीं चुन्धियाँ न जायें
काएनात की आँखें 
और सोख ले
आस्तीन वो ताज़ा मोती
और.... चाहता हूँ
वो आरज़ू

यूँ ही पलकों पे हर शाम खेलती रहे 
यूँ ही ताज़ा मोतीओं से बहलती रहे 




Wednesday, December 1, 2010

ख़वाब

रोज़ समझाता हूँ उसे 
कम मचल ,
कहीं टूट कर बिखर गया तो
मुश्किल हो जायेगा, 
नंगी उंगलीओं से किरचों को चुनना 
और अंगड़ाई भी मत ले
कहीं उधड गयी पोशिश की सीवन,
तो कम पड़ जायेगा धागा तुरपाई के लिए
पर समझता कहाँ है वो,
रूठ के बैठ जाता है किसी कोने में
और कूदने फांदने लगता अपनी धुन में 
अपनी ही ज़िद में 
टूट कर बिखरता तो नहीं ,
पर अक्सर उधेड़ लेता है पोशिश की सीवन 
और कम पड़ने लगता है मुझे, 
हर  बार  धागा तुरपाई के लिए

कुछ ख़वाब बहुत जिद्दी होते हैं ............... 

Sunday, November 28, 2010

कुर्बतों के फासिले

                 आज कल खुद्कलामी का वक़्त ढूंढे भी नहीं मिलता. कभी खुद्कलामी में यादों की ज़्म्बील खोलें तो बहुत सी पुरकशिश अधूरी ख्वाहिशें हालात की गर्द में पाएमाल मिलती हैं. क्यूंकि पूरी हुई ख्वाहिशों और ख्वाबों की कशिश तो शुक्राने की रस्म के बाद ही खत्म हो जाती है. कशिश ही नासहल रास्तों को इख्तियार करने की हिम्मत देती है. अर्णव आज फिर पगडण्डी के सहल रास्ते को छोड़ कर एक नासहल रास्ते से पहाड़ी के ऊपर चढ़ता जा रहा था. ये रास्ता कभी सहल न था लेकिन  डूबते सूरज को देखने की कशिश हर बार इस नासहल रास्ते पर भारी  पड़ती.  वो एक इबाद्तगुजार की तरह अपनी इबादतगाह की तरफ बावक्त आगे बढ़ता जा रहा था. अंजलि आज भी वहां नहीं थी. अंजलि रोज़ ही वहां नहीं होती थी लेकिन यह तस्सवुर उसकी आदत में शुमार था. पहाड़ी पर बैठ कर डूबते सूरज को देखते हुए अपने ख्यालों कि चेहरा नवीसी उसके मामूल का  एक हिस्सा थी.पहाड़ी से दूर वादी में एक पीला बल्ब टिमटिमाता हुआ सूरज को शिकस्त देने को कोशिश करता .जब सूरज डूब कर सारा मंज़र तारीक कर देता तो  वो पीला बल्ब उसे अंजलि से मिलने का एक वसीला सा लगता. जब पहाडिया अपनी गाय अन्दर करता तो उसके भी लौटने का वक़्त हो जाता, जहाँ लोगों कि तंज़ आमेज़ नज़रें उसका इंतज़ार कर रहीं होतीं.  खुद्सुपुर्दगी उसे कभी अच्छी नहीं लगी . अक्सर एक सवाल उसके ज़हन में उभरता कि वो आज़ाद होते हुए भी कई चीज़ों से कितना बंधा हुआ है.....  
             
                अंजलि अर्णव का वो ख़्वाब थी  जो उसकी ज़हनी शख्सियत को  पुख्तगी बख्श रही थी.वो अंजलि से जब भी मिलता तो दोनों एक दूसरे को अपने रिश्ते की  रूहानियत समझाने  लगते. किस तरह एक न नज़र आने वाला एहसास दोनों को बांधे है. दोनों एक ही बात पे हँसते हैं, एक ही बात पे रोते हैं, एक ही वक़्त में एक बात सोचते हैं और इतने फासले पर होने पर भी सुन लेते हैं एक दूसरे को. सब्र आज़मां हालात और कम वसीले उन्हें जिस्मानी तौर पर जितना दूर किये जा रहे थे, ज़हनी तौर पर वो उतने ही करीब आ रहे थे. कभी कभी अंजलि अर्णव को दूर वादी में जलते उस पीले बल्ब कि तरह लगती जो हर शाम सूरज को शिकस्त देने की कोशिश में होता और दुनिया को उस वक़्त रौशनी बख्शता जब कायनात में हर तरफ तारीकी ही तारी होती.

                  "आज तुम मुझे बहुत दिन बाद मिल रही हो" अर्णव ने अंजलि से शिकायती लहजे में कहा. अंजलि ने अर्णव का हाथ अपने हाथ  में लेकर उसे अपने एहसास कि गर्मी से वाबस्ता कराया. आँखों से ढलकते अश्क  मोतियों कि शक्ल में  दोनों के आरिज़ ओ चश्म को ताबानी बख्श रहे थे. पानी यूँ तो बुनियाद के लिए अच्छा नहीं होता, इस के बरअक्स आँखों से ढलते अश्क उनकी ज़हनी कुर्बत कीबुनियाद को पुख्ता कर रहे थे. अर्णव अक्सर तन्हाई में जब भी अंजलि को अपने जज़्बात और ख़याल आराई बयाँ करता तो अर्णव का मासूम अंदाज़ अंजलि कि नज़रों में उसकी इज्ज़त अफज़ाई करता .आज अर्णव से डूबते हुए सूरज और टिमटिमाते पीले बल्ब  का मंज़र सुनते हुए  अंजलि को यह कुर्बतों के फासिले नाकाबिले बर्दाश्त हो रहे थे.  हकीक़त में अर्णव से दूर होना उसे गुनाह लगने लगा. अंजलि ने अर्णव को खींच कर अपने आगोश में लिया . अर्णव को अंजलि कीआँखों में वादी का वो पीला बल्ब पुररोशन दिखाई देने लगा.


                 वक़्त कि पाबन्दी आज फिर उस इबादात् गुज़ार को उसकी इबादत गाह की तरफ उसी नासहल रास्ते से ले कर जा रही थी. आज न  जाने क्यूँ  अर्णव को यूँ लग रहा था जैसे उसकी एह्सासी मिलकियत से कोई उससे पहले गुज़र गया है. दबी हुई मिटटी के नक्श  और पायमाल नख्ल उसके ख्याल की गवाही दे रहे थे. तमाम मुश्किलात के बाद जब अर्णव अपनी ख़ाम ख़याली में पहाड़ी पर पहुंचा तो अंजलि सामने डूबते हुए सूरज को देख रही थी. डूबते हुए सूरज कि  सिन्दूरी रंगत  में उसे अंजलि का मासूम चेहरा  पुरजमाल नज़र आ रहा था . अर्णव  अपनी ख़ाम ख़याली में अंजलि के पहलु में बैठ गया. जब  वादी का पीला बल्ब सूरज को शिकस्त देने की एक कामयाब कोशिश में था  तब अंजलि ने अर्णव का हाथ पकड़ कर उसके ख्यालों के सिलसिले को तोडा और उसे लेकर उस पीले बल्ब की ज़ानिब चलने लगी और अर्णव एक मासूम बच्चे की तरह अंजलि की कदम बोसी करने लगा............